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Dr. Santosh Giri  - Veterinarian, Varanasi

Dr. Santosh Giri

87 (39 ratings)
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Veterinarian, Varanasi

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Dr. Santosh Giri 87% (39 ratings) B.V.Sc Veterinarian, Varanasi
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My experience is coupled with genuine concern for my patients. All of my staff is dedicated to your comfort and prompt attention as well....more
My experience is coupled with genuine concern for my patients. All of my staff is dedicated to your comfort and prompt attention as well.
More about Dr. Santosh Giri
Dr. Santosh Giri is one of the best Veterinarians in Vikas Nagar, Ballia. She has had many happy patients in her 10 years of journey as a Veterinarian. She studied and completed BVSC. You can meet Dr. Santosh Giri personally at Dog Care Centre in Vikas Nagar, Ballia. Don?t wait in a queue, book an instant appointment online with Dr. Santosh Giri on Lybrate.com.

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Info

Education
B.V.Sc - Ranchi Veterinary College - 2007
Past Experience
Vet Surgeon & Physician at Vet n Pet Clinic,Srinagar Colony,Hyderabad
Vet Surgeon at Dr.Dog Clinic,Banjara hills,hyderabad
Vet Surgeon in ABC at Animal Welfare Society,Hyderabad
Languages spoken
English
Hindi
Professional Memberships
Vets Beyond Borders

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Pet Friends Dog Clinic

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My pup is 4 months old and is not able to walk through his hind limbs since last 20 days, visited a doctor and he suggested only calcium and multi vitamins but no improvement observed. Conditions are worsen now his all limbs are not taking bow shape, please help.

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi
My pup is 4 months old and is not able to walk through his hind limbs since last 20 days, visited a doctor and he sug...
It is rickets. Get weekly shots of vtamin d3 along with calcium and phosphorus injections biweekly. Physiotherapy also needed simultaneously.
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Cherry Eye in Dogs

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi
Cherry Eye in Dogs

Cherry eye is a disorder of the nictitating membrane (nm), also called the third eyelid, present in the eyes of dogs and cats. Cherry eye is most often seen in young dogs under the age of two. Common misnomers include adenitis, hyperplasia, adenoma of the gland of the third eyelid; however, cherry eye is not caused by hyperplasia, neoplasia, or primary inflammation. In many species, the third eyelid plays an essential role in vision by supplying oxygen and nutrients to the eye via tear production. Normally, the gland can evert without detachment. Cherry eye results from a defect in the retinaculum which is responsible for anchoring the gland to the periorbita. This defect causes the gland to prolapse and protrude from the eye as a red fleshy mass. Problems arise as sensitive tissue dries out and is subjected to external trauma. Exposure of the tissue often results in secondary inflammation, swelling, or infection. If left untreated, this condition can lead to keratoconjunctivitis sicca (kcs) and other complications.

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Vaccination In Pets

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi
Vaccination In Pets

Vaccination in dog

टीकाकरण की प्रकिया एक ऐसा उपाय है जिससे, कुत्तो में होने वाली कुछ प्रमुख विषाणु एवं जीवाणु जनित जानलेवा एवं लाइलाज, बीमारियों जैसे कैनाइन डिस्टेंपर, हेपेटाइटिस, पार्वो वायरस, लेप्टोस्पायरोसिस, रेबीज तथा केनल कफ़ आदि से बचाव के लिए समय समय पर कुत्तों के शरीर में टीका लगाया जाता है,जिससे इन रोगों के खिलाफ रोगप्रतिरोधक क्षमता का शारीर में विकास हो जाता है और हमारा पालतू जानवर एक सिमित अवधि तक इन बिमारियों के घातक प्रभाव से बचा रहता है |

कुछ टीकाकरण संबंधी सामान्य प्रश्नो के जबाब -
 
१- क्या सभी उम्र के कुत्तो का टीकाकरण जरूरी होता है?
हाँ। आमतौर पर १. ५ महीने (४५ दिन) के उम्र से ऊपर सभी कुत्तो का नियमित समय पर टीकाकरण करना जरूरी होता है यदि किसी कारण वश नयमिति या कभी कराया ही न गया हो तो किसी भी उम्र से टीकाकरण शुरू किया जा सकता है। 

२. छोटे बच्चो को किस उम्र से टीका का पहली खुराक देना शुरू करना चाहिए?
४५ दिन के उम्र से ही टीके की पहली खुराक देना बेहद जरूरी होता है 

३. क्या सभी छोटे पप्स को टीकाकरण के पहले पेट के कीड़े देना जरूरी होता है -
हाँ। बहुत से परजीवी ऐसे होते है जो माँ के पेट से ही या दूध के जरिये से बच्चे के शरीर में प्रवेश कर जाते है जिससे शरीर को कमजोर कर देते है और जब टीका लगाया जाता है तो कमजोरी के वजह से उतना अच्छा शरीर में प्रतिरोधक छमता का विकास नहीं हो पता इसलिए पहले ऐसे परजीवीओ को नष्ट करना जरूरी होता है 

४. क्या होता है टीकाकरण का सही उम्र और समयांतराल?
१. पहली खुराक -जन्म के ६ -८ सप्ताह के उपरांत(कैनाइन डिस्टेंपर, हेपेटाइटिस, पार्वो वायरस, लेप्टोस्पायरोसिस, पैराइन्फ़्लुएन्ज़ा हेतु) 
२. बूस्टर खुराक या दूसरी खुराक - प्रथम खुराक के २-३ सप्ताह बाद ; फिर दूसरी खुराक के ठीक एक साल बाद वार्षिक खुराक साल में एक बार पूरी उम्र तक लगवाते रहना चाहिए। 
३. तीसरी खुराक - रेबीज वायरस हेतु- प्रथम खुराक जन्म के ३ माह के उपरान्त। 
४. बूस्टर खुराक या चौथी खुराक - तीसरी खुराक के २-३ सप्ताह बाद ; फिर तीसरी खुराक के ठीक एक साल बाद वार्षिक खुराक साल में एक बार पूरी उम्र तक लगवाते रहना चाहिए। 

५. क्या बूस्टर खुराक देना जरूरी होता है या नहीं?
जन्म के साथ ही माँ से प्राप्त एंटीबाडीज और प्रथम दूध से मिलने वाली सुरछा कवच कुछ सप्ताह तक नवजात के खून में मौज़ूद रह करअनेको बीमारयों से सुरछा प्रदान करती है परन्तु समय के साथ साथ इनकी मात्रा बच्चे के शरीर में कम होने लगती है। जिससे बीमारी होने की आशंका बढ़ जाती है इसलिए लगभग ४५ दिन के बाद टिका का प्रथम खुराक देते है यद्पि ये पता नहीं रहता की माँ से मिलने वाली सुरछा का असर किस स्तर का है जिससे आमतौर पर ये स्तर अधिक होने पर प्रथम खुराक से बच्चे के शरीर में टीकाकरण की गुणवत्ता को बाधित करती है, जो की पप्पस में रोगप्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करने में असक्षम हो जाता है इसलिए कुछ सप्ताह बाद टीकाकरण के दूसरी खुराक दे कर टीकाकरण से रोगप्रतिरोधक क्षमता करने के उद्देश्य को प्राप्त करते है ऐसी दूसरी खुराक को बूस्टर खुराक कहते है। 

६. क्या है टीकाकरण की सही खुराक देने के मात्रा:
डॉग चाहे किसी भी उम्र, भार, लिंग अथवा नस्ल के हों उनको समान मात्रा में टीकाकरण का खुराक दिया जाता है 

७. क्या है टीकाकरण का सही तरीका:
टीकाकरण खाल के नीचे:कैनाइन डिस्टेंपर, हेपेटाइटिस, पार्वो वायरस, लेप्टोस्पायरोसिस, पैराइन्फ़्लुएन्ज़ा तथा रेबीज जैसी बीमारियों की रोकथाम के लिए खाल के नीचे दिया जाता है
 नथुनों में:केनल कफ़ का टीकाकरण कुत्ते के नथुनों में दवा डाल कर किया जाता है

८. क्या सभी टीके एक ही प्रकार के होते है:कुत्तों में टीकाकरण दो प्रकार की होती है
 १. कोर टीकाकरण - टीकाकरण जो सभी कुत्तों के लिये आवश्यक है. यह उन बिमारीयों में दिया जाता है जो आसानी से फैलती हैं अथवा घातक होती हैं जैसे रेबीज, एडीनोवायरस, पार्वोवायरस, और डिस्टेंपर.
 २. नान कोर टीकाकरण – उपरोक्त ४ बिमाँरीयों (रेबीज, एडीनोवायरस, पार्वोवायरस, और डिस्टेंपर) के टीकाकरण को छोड़कर अन्य सभी नानकोर टीकाकरण माना जाता है | यह उन बिमाँरियों से सुरक्षा प्रदान करता है जो वातावरण के अनावरण अथवा जीवनचर्या पर निर्भर करती है जैसे लाइम डिजीज, केनलकफ और लेप्टोस्पाइरोसिस.

९. एक सफल टीकाकरण करने के बाद क्या फिर भी टीकाकरण विफल हो सकता है?हाँ। 
 टीकाकरण के विफलता के कारण कुत्ते में बीमारी होने के निम्नलिखित मुख्य कारण हो सकते है –
१. टीकाकरण के दौरान कुत्ते की रोगप्रतिरोधक क्षमता का सम्पूर्ण रूप से कार्य न करना |
२.आयु – कम उम्र के जानवरों की प्रतिरक्षा प्रणाली पूर्णतः विकसित नही होती और बड़े आयु के जानवरों की प्रतिरक्षा प्रणाली कई कारणों से अक्सर कमज़ोर या क्षीण हो जाती है |
३. मानवीय चूक (टीके का अनुचित संग्रहण या अनुचित मिश्रण)- टीकों का संग्रहण एवं इस्तेमाल भी निर्देशानुसार ही होना आवश्यक है | सूरज की रोशनी,गर्म तापमान टीके के प्रभाव को नस्ट कर सकता है | टीके का मिश्रण पशु में टीकाकरण के तुरंत पहले तैयार करना चाहिए | टीके खरीदने के पहले पता करना चाहिए कि टीकों को उचित तापमान एवं देखभाल से रखा गया है या नहीं |
४. डीवार्मिंग – टीकाकरण करने के पहले पेट के कीड़े मारने के लिए डीवर्मिंग करना आवश्यक है, वरना इस तरह का तनाव टीकाकरण के प्रभाव को कम कर सकता है |
५. गलत सीरोटाईप / स्टेन का इस्तेमाल – प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया बहुत विशिष्ट होती है | अतः टीके में होने वाली जीवाणु या विषाणु की सही स्टेन होनी चाहिए वरना उससे उत्पन्न होने वाली प्रतिरक्षा जानवर में सही तौर पर सुरक्षा नहीं कर पाती |
६. अनुवांशिक बीमारियाँ – कुछ जानवरों में आनुवंशिक बिमारियों की वजह से सभी रोगों के लिए प्रतिरोधक छमता सामान्य तौर पर कम ही उत्पन्न हो पाती है |
७. वैक्सीन की गुणवत्ता – टीके में प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रोत्साहित करने के लिए प्रयाप्त मात्रा में प्रतिजनी की मात्रा होना चाहिए वरना टीकाकरण के बाद प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रयाप्त नहीं होती है |
८. पुराने या अवधि समाप्त टीके – पुराने टीकों में आवश्यक प्रतिजनी गुण समाप्त या कम हो जाता है | इस तरह के टीके लगाने से जानवरों को बेमतलब तनाव दिया जाता है |
९. टीकाकरण का अनुचित समय – टीका निर्माता के निर्देशों के अनुसार टीकाकरण का समय (उम्र एवं मौसम के अनुसार), लगाने का तरीका एवं मात्रा तथा दोबारा लगाये जाने की अवधि, इत्यादि निश्चित होता है |इन निर्देशों का पालन सही समय पर न करने से टीकाकरण विफल या निष्क्रिय हो जाता है |
१०. पोषण की स्तिथि- कुपोषण की वजह से जिन पशुओं में पोषक तत्वों की कमी रह जाती है उनमे टीकाकरण के बाद भी प्रतिरोधक छमता सामान्य तौर पे कम ही उत्पन्न हो पाती है |

10. क्या वैक्सीन लगते समय कुत्ते पर कोई दुस्प्रभाव हो सकते है? हाँ 
 कुछ कुत्तो प्रतिरोधक छमता अधिक सक्रिय होने की वजह से कुछ सामान्य लचण जैसे ज्वर, उल्टी, दस्त, लासीका ग्रंथियों का सूजना, मुख का सूजना, हीव्स, यकृत विफलता और कभी -कभी मौत भी हो सकती है।

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What To Do If Your Pet Is Found Bleeding?

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi
What To Do If Your Pet Is Found Bleeding?

Bleeding pets often suffer blood loss as a result of trauma. If bleeding is severe or continuous, the animal may lose enough blood to cause shock (loss of as little as 2 teaspoons per pound of body weight may cause shock). Emergencies may arise that require the owner to control the bleeding, even if it is just during transport of the animal to the veterinary facility. Pet owners should know how to stop hemorrhage (bleeding) if their pet is injured.

 Techniques to stop external bleeding:-

 The following techniques are listed in order of preference. 

1) Direct pressure:--gently press a compress (a pad of clean cloth or gauze) over the bleeding absorbing the blood and allowing it to clot. Do not disturb blood clots after they have formed. If blood soaks through, do not remove the pad; simply add additional layers of cloth and continue the direct pressure more evenly. The compress can be bound in place using bandage material which frees the hands of the first provider for other emergency actions. In the absence of a compress, a bare hand or finger can be used. Direct pressure on a wound is the most preferable way to stop bleeding.

2) Elevation:--if there is a severely bleeding wound on the foot or leg, gently elevate the leg so that the wound is above the level of the heart. Elevation uses the force of gravity to help reduce blood pressure in the injured area, slowing the bleeding. Elevation is most effective in larger animals with longer limbs where greater distances from wound to heart are possible. Direct pressure with compresses should also be maintained to maximize the use of elevation. Elevation of a limb combined with direct pressure is an effective way to stop bleeding. 

3) Pressure on the supplying artery:-- if external bleeding continues following the use of direct pressure and elevation, finger or thumb pressure over the main artery to the wound is needed. Apply pressure to the femoral artery in the groin for severe bleeding of a rear leg; to the brachial artery in the inside part of the upper front leg for bleeding of a front leg; or to the caudal artery at the base of the tail if the wound is on the tail. Continue application of direct pressure.

4) Pressure above and below the bleeding wound:-- this can also be used in conjunction with direct pressure. Pressure above the wound will help control arterial bleeding. Pressure below the wound will help control bleeding from veins.

5) Tourniquet:--use of a tourniquet is dangerous and it should be used only for a severe, life-threatening hemorrhage in a limb (leg or tail) not expected to be saved. A wide (2-inch or more) piece of cloth should be used to wrap around the limb twice and tied into a knot. A short stick or similar object is then tied into the knot as well. Twist the stick to tighten the tourniquet until the bleeding stops. Secure the stick in place with another piece of cloth and make a written note of the time it was applied. Loosen the tourniquet for 15 to 20 seconds every 20 minutes. Remember this is dangerous and will likely result in disability or amputation. Use of a tourniquet should only be employed as a last-resort, life-saving measure!

6) Internal bleeding:--internal bleeding is a life-threatening condition, but it is not obvious like external bleeding. Any bleeding which is visible is external. 
Internal bleeding occurs inside the body and will not be seen. There are, however, external signs of internal bleeding: 
• the pet is pale (check the gums or eyelids).
• the pet is cool on the legs, ears, or tail. 
• the pet is extremely excited or unusually subdued. If any of these signs are evident, the pet should be immediately transported to a veterinary facility for professional help. Remember: internal bleeding is not visible on the outside.

I am having a Persian cat and have noticed a puss kind of stuff around his ear any suggestions can I put ear drops which we human use in his ears or what to do vet not close by so I can't take him there at least for a week please suggest.

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi
I am having a Persian cat and have noticed a puss kind of stuff around his ear any suggestions can I put ear drops wh...
Pus coming from ear is Otitis. You need to clean the ears thoroughly with hydrogen peroxide and ear cleaners. If it's severe, you need to take a course of antibiotics for a week or so. Ear drops need to be instilled three to four times daily.
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Family Planning In Pets!

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi

For dogs (males)- orchidectomy or surgical excision of testicles is the best option. It can be performed as early as 6 months of age and should be done before the age of puberty.
Advantages-relief from unwanted mating and control of uro-genital infections. Also, testicular tumors, sertoli cell tumor  benign prostatic hyperplasia (b. P. H.) can be easily controlled. Moreover males can get rid off their dominance related aggressions.

B.V.Sc
Veterinarian, Varanasi
First aid kits for pets
.
Thermometer
Betadine
Paracetamol syrup
Hydrogen peroxide
Powergyl syrup
Vomikind syrup
Zymopet drops
Cotton bandages
Glycerine
Ear cleanser
Ice packs
Mouth cap/basket muzzle
Elizabethan collar.
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Veterinarian, Varanasi
The skin of your dog is entirely different from ours. There is significant ph difference so their skin is more sensitive than ours. Their body secretes some essential oils which gets depleted once you start bathing them daily. It results in drying of skin leading to flakes formation of policy kit is.
Some tips to remember---
*bathe your pets once in 10 days.
*groom your pets daily.
*do not use dettol/phenolic compounds on their body. It can be allergic.
*don't allow ticks/fleas/mites to thrive on their body.
*for hairy breeds, go for a complete hair-cut in summers.
*for breeds with drooping ears, take special care about ear cleaning.
*never use human soaps & shampoos like dove/clinic plus on dogs body. It can cause allergic dermatitis.
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