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Dr. Sanjeev Kumar Singh  - Ayurveda, Lakhimpur Kheri

Dr. Sanjeev Kumar Singh

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To provide my patients with the highest quality healthcare, I'm dedicated to the newest advancements and keep up-to-date with the latest health care technologies.
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ब्लड कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार - Blood Cancer ka Ayurvedic Upchar!

Bachelor of Ayurveda, Medicine and Surgery (BAMS)
Ayurveda, Lakhimpur Kheri
ब्लड कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार - Blood Cancer ka Ayurvedic Upchar!

ब्लड कैंसर को एक जानलेवा और घातक बीमारी माना जाता है. यह एक ऐसी बीमारी है जो व्यक्ति को शारीरिक अंगों के साथ मानसिक रूप से भी प्रभावित करता है. कैंसर कई प्रकार के होते है, जैसे ब्लड कैंसर, लंग कैंसर, बोन कैंसर इत्यादि. यह सभी ब्लड कैंसर को माइलोमा, लिम्फोमा और ल्यूकेमिया जैसे तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है. ब्लड कैंसर के मेडिकल डिसऑर्डर है जिसमे कैंसर सेल्स लिम्फैटिक प्रणाली, बॉन मेरो और ब्लड को प्रभावित करती हैं.

ल्यूकेमिया- कैंसर का यह रूप हमारे बॉडी में वाइट ब्लड सेल्स को प्रभावित करता है. सफेद रक्त कोशिकाएं हमारे शरीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इन्फेक्शन से लड़ती है और आपकी इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाती है. ल्यूकेमिया के दौरान, बॉडी असामान्य ब्लड सेल्स का उत्पादन करते हैं जो आपके बोन मेरो को अवरुद्ध करते हैं.

आयुर्वेद के अनुसार कैंसर के कारण-
आयुर्वेद के अनुसार बॉडी में असंतुलन का कारण बॉडी में अत्यधिक टॉक्सिक या एक से अधिक बीमारी की अभिव्यक्ति माना जाता है. इसके अलावा ब्लड कैंसर के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं.
1. संचय- जहाँ एक से अधिक दोषों में वृद्धि हो
2. उत्तेजना- एक दोष के स्तर में वृद्धि के कारण बाकी दोषों के असंतुलित होने के कारण
3. अतिप्रवाह- इस स्थिति में बॉडी में एसिड या टॉक्सिक वेस्ट फैलते है.
4. स्थानीयकरण- बॉडी के किसी कमज़ोर हिस्से पर कोई बीमारी होना
5. डीएनए में क्षति बॉडी के सेल विभाजन में शामिल जीन को नुकसान पहुंचाते हैं.
6. खराब आदत जैसे तम्बाकू, अभ्रक, आर्सेनिक, रेडिएशन, अल्ट्रावायलेट रे का एक्स्पोसेर इत्यादि.
7. शराब का अत्यधिक सेवन करना
8. अनियंत्रित मोटापा
9. एक्सरसाइज न करना
10. एक्स-रे, गामा-रे सेलुलर फ़ोन और सेल टावर के रेडिएशन ओवर एक्स्पोजर

कैंसर के लक्षण-

  • बुखार
  • थकान
  • असामान्य ब्लीडिंग
  • कफ
  • पाचन समस्या या निगलने में परेशानी
  • अचानक वजन कम होना या बढ़ना
  • त्वचा में बदलाव


ब्लड कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार-
कैंसर का अभी तक कोई निश्चित उपचार प्रणाली विकसित नहीं हुआ है. वर्तमान समय में मेडिकल साइंस के पास किमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, बायोलॉजिकल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट थेरेपी मौजूद है. हालाँकि ब्लड कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार भी मौजूद है.आयुर्वेदिक चिकित्सा ने भी दावा किया है की आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी के इस्तेमाल से ब्लड कैंसर का उपचार किया जा सकता है. ब्लड कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार रोगी की गंभीरता, उम्र और ल्यूकेमिया के प्रकार पर निर्भर करता है.

ब्लड कैंसर का आयुर्वेदिक उपचार निम्नलिखित है:
1. अभ्यंगा मालिश-
यह आयुर्वेदिक चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह आम-तौर पर विशिष्ट आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और आवश्यक तेलों से बॉडी की मालिश पर जोर देता है.

2. शिरोधारा- यह एक बेहतर आयुर्वेदिक चिकित्सा है जो नर्वस सिस्टम पर गहरा प्रभाव डालती है. इसमें गर्म तेल की एक पतली धारा को माथे पर एक सतत फ्लो में डाला जाता हैइस हिस्से में तंत्रिकाएं ज्यादा केन्द्रित होती है.

3. स्वीडन- स्वीडन एक हर्बलीजेड स्टीम बाथ है जो सिर और ह्रदय को शांत रखती है, जबकि बाकी बॉडी में नरम हाइपरथेरिया लागू होता है.

4. घर्षना- इस प्रक्रिया में ब्लड सर्कुलेशन को बढाने और त्वचा के छिद्रों को साफ करने के लिए जड़ी-बूटियों की मदद ली जाती है.

5. बस्ती- यह एक प्रकार का एनीमा जिसमें बृहदान्त्र से टोक्सिन से निकालने के लिए आयुर्वेदिक जड़ी- बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है.

6. पंचकर्म- इसका अर्थ “पांच उपचार” है. यह मन, बॉडी और आत्मा के लिए सभी पांच इंद्रियों को संलग्न करके उपरोक्त पांच तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए किया गया है ब्लड कैंसर के आयुर्वेदिक उपचार के समग्र तरीकों में शामिल हैं:

7. पंचकर्म- भोजन और लाइफ स्टाइल में संयम जो त्रिदोष अथार्त वात, पित्त, कफ के असंतुलन को ठीक करता है.
* इसके माध्यम से विषाक्त पदार्थों को समाप्त करता है.
* पाचन शक्ति को बढाता है.
* आयुर्वेदिक दवाइयां किमोथेरेपी के ट्रीटमेंट के साइड इफेक्ट्स को खत्म करता है.

प्रेगनेंसी मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण - Pregnancy Miss Hone Par Garbhawstha Ke Lakshan!

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प्रेगनेंसी मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण - Pregnancy Miss Hone Par Garbhawstha Ke Lakshan!

गर्भवती होना हर महिला एक लिए एक सुन्दर सपने जैसा होता है. माँ बनने के ख्याल से ही महिलाओं के अंदर एक सुखद एहसास का अनुभव होता है. जो महिला गर्भ धारण होने की कोशिश कर रही हैं उनके लिए पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण हो सकते हैं. महिलाओं के जीवन में पीरियड का आना एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. हालाँकि, पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण हो, यह जरुरी नहीं है.

आमतौर पर सेक्स के बाद जब गर्भधारण होता है उस दौरान बहुत ही कम महिलाओं को किसी भी तरह के लक्षण महसूस होते हैं, क्योंकि आजकल ज्यादातर महिलाओं प्रेगनेंसी किट की मदद से गर्भवती होने का पता लगा लेती हैं. हालांकि, कई महिलाओं का कहना है की उन्हें सेक्स के बाद ही कुछ लक्षण महसूस होने लगते हैं, जैसे- थकान, निरंतर पेशाब आना, स्तन दर्द होना, बॉडी टेम्परेचर बढ़ना इत्यादि. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जैसे ही आप गर्भ धारण करने लगती है, आपके हार्मोन में परिवर्तन होने लगता है और आपके बॉडी में कई तरह के बदलाव होने लगती है. हालाँकि, ज्यादातर महिलाएं इन लक्षणों को नहीं समझ पाती है. ऐसे में यदि आप कुछ शारीरिक बदलाव पर ध्यान दें, तो आप गर्भधारण का आसान से पता लगा सकती है.

प्रेगनेंसी के शुरूआती लक्षण:
आमतौर पर गर्भावस्था के शुरूआती लक्षण हर महिला में एक जैसे नहीं होते है. हर महिला की शारीरिक बनावट अलग होती है. यहाँ अधिकांश महिलाओं का मानना है की पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण ही शुरूआती सकेंत होते है. लेकिन इसके परे भी गर्भवती के शुरूआती लक्षण होते हैं, जैसे- जी मचलना या उल्टी आना, स्तन में बदलाव होना या अंडे का गर्भाशय में प्रवेश होने के दौरान ब्लीडिंग इत्यादि.

गर्भावस्था के लक्षण कब शुरू होते हैं?
ऐसा माना जाता है गर्भावस्था का पहला सप्ताह महिला के लास्ट पीरियड की तारीख के आधार पर तय होता है. गर्भावस्था होने की पृष्टि प्रेगनेंसी टेस्ट और प्रेगनेंसी अल्ट्रासाउंड से ही की जा सकती है. लेकिन ऐसे कुछ शारीरिक संकेत और लक्षण भी है जो आपको गर्भवती होने की पृष्टि करती है. इस बात का ध्यान रखें की आप केवल प्रेगनेंसी टेस्ट की मदद से ही पूरी तरह से सुनाश्चित कर सकती हैं की आप प्रेग्नेंट है या नहीं.

स्पॉटिंग और क्रैम्पिंग है गर्भवती होने के लक्षण-
यह संकेत आमतौर पर भ्रूण के शुरूआती समय में बनने वाले हल्का ब्लीडिंग या स्पॉटिंग होता है. पुरुष में स्पर्म से अंडा फर्टीलाइज होने के बाद जब अंडे से भ्रूण बनना शुरू होता है, तब वह 6 से 12 दिनों में वह यूटेरस से जुड़ जाता है. इस दौरान यूटेरस से ब्लीडिंग होता है. भ्रूण बनने के दौरान इस तरह की ब्लीडिंग सामान्य होती है.इसे ही मेडिकल टर्म में स्पाॅटींग कहा जाता है. इस तरह की स्थिति नुकसानरहित होता है. इसके अतिरिक्त कुछ महिलाओं में ऐंठन का भी अनुभव होता है.

पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण-
यह अक्सर देखा जाता है की प्रेग्नेंट होने पर पीरियड आने बंद हो जाते हैं. प्रेगनेंसी में पीरियड का न आना शुरूआती लक्षणों में से एक माना जाता है. पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण को अधिकांश महिलाएं अनुभव करती हैं. यदि आपके पीरियड नियमित रूप से न आएं, तो इस स्थिति को प्रेगनेंसी के लक्षण समझा जाता है. इसके अलावा पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण को पृष्टि करने के लिए प्रेगनेंसी टेस्ट भी करवा सकती हैं.

स्तन में सूजन हैं गर्भावस्था के शुरूआती लक्षण-
प्रेगनेंसी होने के कारण हार्मोनो में भी परिवर्तन होता है. ऐसे में स्तनों में दर्द या सूजन हो सकता है साथ ही कुछ धब्बे भी पड़ सकते हैं. अगर पीरियड मिस होने पर गर्भावस्था के लक्षण को जानने के लिए प्रेगनेंसी टेस्ट भी किया जा सकता है.

गर्भावस्था के लक्षण हैं जी मचलना या पेट दर्द-
गर्भावस्था के बाद सुबह आलस आना या पेट दर्द होता है तो ऐसे में आपका जी मचलता है. यह हार्मोन बदलने के कारण भी होता जिससे महिलाएं असहज महसूस करती हैं.

भूख में वृद्धि:
गर्भावस्था के लक्षण में भूख में वृद्धि भी शामिल है. आपको हर थोड़ी देर में भूख लगेगी और आप हमेशा कुछ ना कुछ खाते रहना चाहती है. पीरियड रुकने से पहलें आपको ऐसे लक्षण जरुर अनुभव होंगे. लेकिन आपको अपने खाने पर कंट्रोल करना होगा, इससे मोटापे का जोखिम पैदा हो सकती हैं.

सिरदर्द भी है गर्भावस्था के लक्षण-
पहले की दिनों में सिरदर्द होना सामान्य नहीं होगा, लेकिन गर्भाधारण करने के बाद सिरदर्द होना एक सामान्य बात बन गयी होगी। ऐसा भी हो सकता है आपके बॉडी में ब्लड वॉल्यूम का बढ़ना और ब्लड फ्लो का काम होना इसकी वजह हो जो प्रेगनेंसी से जुड़ा परिवर्तन है। सिरदर्द का कारण शिशु की वजह से बॉडी पर पड़ने वाला दबाब भी हो सकता है. इन सारे परिवर्तन की वजह से होने वाली टेंशन सिरदर्द में बदल सकती है.

होम्योपैथी में लकवा का इलाज - Homeopathy Mein Lakwa Ka Ilaj!

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होम्योपैथी में लकवा का इलाज - Homeopathy Mein Lakwa Ka Ilaj!

लकवा एक बहुत ही घातक बीमारी हैं, यह जानलेवा बीमारी तो नहीं लेकिन पीड़ित व्यक्ति अपनी एक या उससे ज्यादा मांसपेशियों को हिलाने में असमर्थ हो जाता है. यह आपके शरीर को गतिहीन बना देता है जिससे आपके दूसरे पर निर्भरता बढ़ जाती है. लकवा मांसपेशियों में किसी कारण से नहीं होता है, बल्कि मस्तिष्क से अंगों में मैसेज पहुंचाने वाली नर्व और स्पाइनल प्रभावित होने की स्थिति में होता है. इसका मतलब है मांसपेशियों की गति समाप्त हो जाना और बॉडी के अन्य हिस्सों में समन्वय खत्म हो जाता है. जिस हिस्से में लकवा मारता है जैसे हाथ, पैर और चेहरा आदि उन विशेष अंगों की मांसपेशियों में गति के साथ संवेदना समाप्त हो जाता है. जिससे व्यक्ति को गर्म, ठंडक, या दर्द का अनुभव नहीं होता है. होम्योपैथी में लकवा का इलाज बहुत ही प्रभावी तरीकें से किया जाता है. हालाँकि, यदि स्थिति गंभीर हो तो अपको हॉस्पिटल में एडमिट होना भी पड़ सकता है.

लकवा को मेडिकल भाषा में पैरालिसिस के नाम से जाना जाता है. इसके अलावा सामान्य भाषा में पक्षाघात, फालिज, कम्पवायु इत्यादि के नाम से भी जाना जाता है.

लकवा मुख्य रूप से निम्न प्रकार का हो सकता है.
इसके प्रकार को प्रभावित अंग के अनुसार विभाजित किया गया है.

1. मोनोप्लेजिया: इसमें बॉडी का एक हाथ पर पैर प्रभावित होता है.
2. डिप्लेजिया: इस प्रकार में बॉडी के दोनों हाथ या पैर में लकवा मार सकता हैं.
3. पैराप्लेजिया: इसमें बॉडी के दोनों धड़ को लकवा मार सकता है.
4. हेमिप्लेजिया: इसमें बॉडी के एक तरफ के अंग प्रभावित हो जाते है.
5. क्वाड्रिप्लेजिया: इसमें धड़ और चारों हाथ और पैर प्रभावित हो सकते हैं.

लकवा के निदान रोगी के लक्षण, शारीरिक परिक्षण और अन्य टेस्ट आदि के आधार पर किया जाता है. अगर किसी पीड़ित में लकवा स्थायी हो चूका है तो उसका ट्रीटमेंट नहीं किया जा सकता है, लेकिन कुछ डिवाइस की मदद से रोगी के जीवन को जितना हो सके सुविधाजनक बनाने की कोशिश की जाती है. होम्योपैथी में लकवा का इलाज भी संभव है, बस इस बात का ध्यान रखें की किसी अच्छे होम्योपैथी डॉक्टर ने दवा निर्धारित की हो.

लकवा के लक्षण:
आमतौर पर लकवा के लक्षण आसानी से पहचाने जा सकते है. इसमें रोगी के कुछ विशिष्ट अंग या कोई बड़ा हिस्सा कार्य करने या महसूस होना बंद हो जाता है. इसके लक्षण निम्नलिखित है:
1. चेतना की कमी
2. सुन्न पड़ना,
3. सिर में तेज दर्द होना
4. सांस लेने में कठिनाई
5. मुंह से लार गिरना
6. सोचने समझने या पढने या बोलने में कठिनाई
7. मूड या बिहेवियर में परिवर्तन

लकवा के कारण-
लकवा हमेशा सेंट्रल नर्वस सिस्टम जिसमे मस्तिष्क और स्पाइरल कार्ड शामिल है में समस्या या पेरिफेरल नर्वस सिस्टम में समस्या के लिए जिम्मेदार है के कारण होता है. इसके मुख्य कारण निचे बताए गए है.
1. स्ट्रोक- यह लकवा का मुख्य कारण होता है. इस बीमारी में मस्तिष्क का एक निश्चित हिस्सा कार्य करना बंद कर देता है. जिससे मस्तिष्क को उचित संदेश प्राप्त या भेजे नहीं जाते है. स्ट्रोक में हाथ या पैर में लकवा होने की ज्यादा संभावना होता है.
2. ट्यूमर- मस्तिष्क अथवा या स्पाइनल कार्ड में विभिन्न प्रकार के ट्यूमर पाए जाते है जो वहां रह कर ब्लड फ्लो को प्रभावित कर के लकवा पैदा करता है.
3. ट्रामा- इंजरी के कारण अंदरूनी ब्लड फ्लो के कारण मस्तिष्क और स्पाइनल कार्ड में ब्लड फ्लो कम हो जाता है जिससे लकवा हो सकता है.
4. सेलिब्रल पैल्सि- यह नवजात के जन्म के समय होता होती है जिसके कारण लकवा हो सकता है.

इसके अलावा अन्य कारणों से भी लकवा हो सकते हैं:

  • पोलियो
  • पेरिफेरल न्यूरोपैथी
  • पार्किंसन्स रोग
  • बोटूलिस्म
  • स्पाइना बिफिडा
  • मल्टीपल स्केलरोसिस
  • गिलैन बैरे सिंड्रोम


होम्योपैथी में लकवा का इलाज:
यदि लकवा लंबे समय बना रहता है तो बॉडी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे बॉडी मात्र हड्डी बन कर रह जाता है. रोगी को देखने, सुनने और बोलने में असमर्थ हो जाता है.

ऐसी स्थिति में गंभीर लकवा रोगी को हॉस्पिटल में भर्ती करवाना पड़ता है. हालाँकि, होम्योपैथी में लकवा का इलाज संभव है. होम्योपैथिक निदान में रोगी के शारीरिक, मानसिक और अन्य लक्षणों को दृष्टिगत रखते हुए ट्रीटमेंट का चयन किया जाता है. इसके कुछ दवाएं निम्नलिखित है:

1. रस टाॅस्क- यह दवा को बॉडी के निचले हिस्से में लकवा होने पर इस्तेमाल किया जाता है. इसके अतिरिक्त यदि लकवा गीला या नाम जगह पर रहने से हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं. बच्चों में होने वाले लकवे के लिए भी फायदेमंद होता है.

2. क्रास्टिकम- यह होम्योपैथिक दवा ठंड या सर्दियों के मौसम में लकवा का अटैक आने पर इस्तेमाल किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, जीभ या चेहरे पर अचानक पड़ने वाले लकवा में भी उपयोग साबित हो सकता है.

3. बेलाडोना- यह बॉडी की सीधी तरह का लकवा ठीक करता है.

4. जक्सवोमिका- यह तब इस्तेमाल होता है जब बॉडी का निचला हिस्सा लकवा से प्रभावित हो और अंग हिलाने में बहुत जोर लगना पड़ता हो.

इसके अतिरक्त अन्य होम्योपैथिक दवा में काॅस्टिकम, जैलासिमियम, पल्म्बम, डल्कामारा, सल्फर नैट्रमयोर इत्यादि शामिल है.

ल्यूकोडर्मा का आयुर्वेदिक इलाज - Leucoderma Treatment In Ayurveda In Hindi!

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ल्यूकोडर्मा का आयुर्वेदिक इलाज - Leucoderma Treatment In Ayurveda In Hindi!

ल्यूकोडर्मा को ही सफ़ेद दाग या विटिलिगो भी कहते हैं. ल्यूकोडर्मा, हमारे बॉडी में होने वाला एक ऐसा डिसऑर्डर है जिसमें बॉडी के विभिन्न भागों की त्वचा पर ल्यूकोडर्मा बनने शुरू हो जाते हैं. यह इसलिए होता है क्योंकि त्वचा में रंग बनाने वाली सेल्स खत्म हो जाती हैं, इन कोशिकाओं को मेलेनोसाइट्स कहा जाता है. अगर ल्यूकोडर्मा बॉडी पर बहुत ज्यादा दिखने लगें तो शीघ्र ही डॉक्टर को जरूर दिखाएं. ल्यूकोडर्मा के शुरूआती लक्षणों को ठीक करने के लिए आप कुछ घरेलू उपायों का भी उपयोग कर सकते हैं. आइए इस लेख के माध्यम से हम ल्यूकोडर्मा के आयुर्वेदिक उपचारों के बारे में जानें ताकि इस विषय में लोगों की जानकारी बढ़ सके.

ल्यूकोडर्मा के लक्षण-

यह एक ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें बॉडी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बॉडी को ही नुकसान पहुंचाने लगती है. इसमें स्किन का रंग बनाने वाले सेल्स मेलानोसाइट खत्म होने लगते हैं या काम करना बंद कर देते हैं, जिससे बॉडी पर जगह-जगह सफेद धब्बे बन जाते हैं. यह समस्या मोटे तौर पर लिप-टिप यानी होठों और हाथों पर, एक्रोफेशियर यानी हाथ-पैर और चेहरे पर, फोकल यानी शरीर में एक-दो जगह पर, सेग्मेंटल यानी शरीर के एक पूरे हिस्से पर और जनरलाइज्ड यानी शरीर के कई हिस्सों पर दाग के रूप में सामने आती है.

ल्यूकोडर्मा के आयुर्वेदिक उपचार-
आयुर्वेद के अनुसार, पित्त या वात्त की असंतुलन से ल्यूकोडर्मा की समस्या होती है. ऐसे लोग जो बहुत ज्यादा फ्राइड, मसालेदार, अनुचित समय पर खाने के अलावा विरुद्ध आहार (अथार्त दूध के साथ नमक या मछली आदि) लेता है, उसमें यह समस्या होने की जोखिम ज्यादा होती है. आयुर्वेद में पंचकर्म के माध्यम से बॉडी को डिटॉक्सिफाई किया जाता है. इसके अलावा बाकुची बीज, खदिर (कत्था), दारुहरिद्रा, करंज, आरग्यवध (अमलतास) आदि सिंगल हर्ब्स के जरिए भी ब्लड को साफ किया जाता है. इसके अलावा, कंपाउंड मेडिसिन जैसे कि गंधक रसायन, रस माणिक्य, मंजिष्ठादी क्वाथ, खदिरादी वटी आदि भी ले सकते हैं. त्रिफला भी इसमें बहुत प्रभावी होता है.

ल्यूकोस्किन भी अच्छी मेडिसिन है. यह ओरल लिक्विड और ऑइंटमेंट, दोनों ही रूप में उपलब्ध है. ओरल लिक्विड से नए ल्यूकोडर्मा नहीं बनने और बॉडी की इम्यूनिटी बढ़ने का दावा किया जाता है, जबकि ऑइंटमेंट से मौजूदा ल्यूकोडर्मा को ठीक किया जाता है. इसके परिणाम 3 महीने में दिखने लगते हैं, जबकि पूरी तरह ठीक होने में दो साल तक का समय लग सकता है.

ल्यूकोडर्मा के आयुर्वेदिक में बरतें ये सावधानियाँ-
आयुर्वेद इसके उपचार और बचाव के लिए आहार और उसके तरीकें पर बहुत बल देता है. आयुर्वेदिक एक्सपर्ट के मुताबिक, पीड़ित को कॉपर के बर्तन में पानी को 8 घंटे रखने के बाद पीना चाहिए. हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, लौकी, सोयाबीन, दाल ज्यादा खाना चाहिए. पेट में कीड़ा न हो और लीवर स्वस्थ रहे, इसकी चेकअप कराएं और डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवा लें. हर रोज एक कटोरी भीगे काले चने और 3 से 4 बादाम खाएं. इसक साथ ही ताजा गिलोय या एलोविरा जूस पीएं, जिससे इम्यूनिटी बढ़ती है.

ल्यूकोडर्मा को तुलसी से दूर करें-
तुलसी, ल्यूकोडर्मा का इलाज करने में मदद करती है. ल्यूकोडर्मा को हटाने के अलावा ये त्वचा में होने वाली खुजली और सूजन को भी ठीक करती है. रोजाना तुलसी के पत्ते चबाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और शरीर स्वस्थ होता है.
तुलसी का इस्तेमाल कैसे करें: तुलसी की 4 से 5 पत्तियों को कम से कम चार से छः महीने तक रोजाना जरूर खाएं. आप एक कप पानी में इन पत्तियों को डालकर भी तुलसी की चाय पी सकते हैं. ल्यूकोडर्मा को तेजी से ठीक करने के लिए प्रभावित क्षेत्र पर तुलसी के पाउडर को पानी में मिलाकर बनाए पेस्ट भी को लगा सकते हैं. तुलसी की पत्तियों का रस निकालें और इसे नींबू के रस के साथ मिलाकर पंद्रह मिनट के लिए प्रभावित जगहो पर लगाएं, इसके बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो लें.

ल्यूकोडर्मा मिटाने के लिए नीम की पत्तियों का इस्तेमाल करें-
नीम को त्वचा संबंधी समस्याओं का इलाज करने के लिए जाना जाता है, जो त्वचा के खोए हुए रंग को लौटाता है. नीम की पत्तियां रोग प्रतिरोधक की तरह कार्य करती हैं और ब्लड को साफ रखती हैं. इसे इस्तेमाल करने के लिए मुट्ठीभर नीम की पत्तियां ले और सबसे पहले मुट्ठीभर नीम की पत्तियों को मिक्सर में मिक्स कर लें. अब इसे एक कप छाछ के साथ मिला लें, जिससे एक नरम पेस्ट तैयार हो सके. अब इस पेस्ट को त्वचा पर लगा लें और फिर सूखने का इंतजार करें. इसके बाद त्वचा को पानी से धो लें और फिर इस उपाय को कई हफ्तों तक इसी तरह दोहराएं.

मूली के बीज ल्यूकोडर्मा को दूर करें-
मूली के बीज ल्यूकोडर्मा के निदान के लिए बेहद उपयोगी होते हैं. मूली के बीज त्वचा की अशुद्धियों को साफ करते हैं और इसमें विटामिन बी, विटामिन सी, जिंक और फास्फोरस होता है जो ल्यूकोडर्मा से छुटकारा दिलाने में मदद करते हैं. सबसे पहले 30 से 40 ग्राम मूली के बीज को पानी में रात भर भिगोने के लिए रख दें. अब सुबह, मूली के बीज को मिक्सर में मिक्स करने के लिए डाल दें. पेस्ट तैयार होने के बाद मिश्रण को प्रभावित क्षेत्र पर लगाएं. लगाने के बाद दो घंटे के लिए पेस्ट को ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. अब त्वचा को पानी से धो दें.

ल्यूकोडर्मा के दौरान क्या न करें-
खट्टी चीजें जैसे नीबू, संतरा, आम, अंगूर, टमाटर, आंवला, अचार, दही, लस्सी, मिर्च, मैदा, गोभी, उड़द दाल आदि कम खाएं. गर्मी बढ़ाने वाली चीजें न खाएं. नॉनवेज और फास्ट फूड कम खाएं. सॉफ्ट डिंक्स के सेवन से बचें.
नमक, मूली और मांस-मछली के साथ दूध न पीएं.
लंबे समय तक तेज गर्मी के एक्सपोजर से बचें.

क्या है इसकी वजह?

  • फैमिली हिस्ट्री, यानी अगर पैरंट्स ल्यूकोडर्मा से पीड़ित रहे हैं तो बच्चों में इसके होने की आशंका रहती है. हालांकि ऐसे मामले 2 से 4 फीसदी ही होते हैं.
  • एलोपेशिया एरियाटा यानी वह बीमारी, जिसमें छोटे-छोटे गोले के रूप में शरीर से बाल गायब होने लगते हैं.
  • ल्यूकोडर्मा मस्से या बर्थ मार्क से मस्सा या बर्थ मार्क बच्चे के बड़े होने के साथ-साथ आसपास की स्किन का रंग बदलना शुरू कर देता है.
  • केमिकल ल्यूकोडर्मा यानी खराब क्वॉलिटी की चिपकाने वाली बिंदी या खराब प्लास्टिक की चप्पल इस्तेमाल करने से.
  • ज्यादा केमिकल एक्सपोजर यानी प्लास्टिक, रबर या केमिकल फैक्ट्री में काम करने वाले लोगों को खतरा ज्यादा. कीमोथेरपी से भी इसकी आशंका रहती है.
  • थाइरॉयड संबंधी बीमारी होने पर.

दांतों में कैविटी कारण और इलाज - Danto Mein Cavity Karan Aur Ilaj!

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दांतों में कैविटी कारण और इलाज - Danto Mein Cavity Karan Aur Ilaj!

कैविटी, जिसे दांत का सडन भी कहा जाता है, एक छेद होता है जो आपके दांत में बनता है. जब इसका उपचार नहीं किया जाता हैं तो यह कैविटी और धीरे-धीरे बड़ी होने लगती हैं. क्योंकि कई गुहाएँ शुरुआत में दर्द का कारण नहीं होती हैं, इसलिए इसे महसूस करना मुश्किल हो सकता है. नियमित डेंटल अपॉइंटमेंट से दांतों की सड़न का जल्द पता लगाया जा सकता है. कैविटी और दांतों की सड़न दुनिया की सबसे सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं में से एक हैं. दांतों में कैविटी बच्चे से लेकर बड़ो तक को हो सकता हैं.

टूथ कैवटी के लक्षण:

कैविटी के लक्षण सङन के गंभीरता पर निर्भर करता है. इसमें शामिल है:
1. दांतों में संवेदना
2. दांत दर्द
3. दांत में छेद होना
4. दांत पर काले या सफेद दाग

डेंटल कैविटी के कारण:

डेंटल कैविटी प्लाक के कारण होते हैं, यह एक चिपचिपा पदार्थ होता है जो दांतों को बांध कर रखता है. पट्टिका का संयोजन है:

* जीवाणु
* लार
* अम्ल
* भोजन के कण

हर किसी के मुंह में बैक्टीरिया होते हैं. शुगर के साथ खाद्य पदार्थ खाने या पीने के बाद, आपके मुंह में बैक्टीरिया चीनी को एसिड में बदल देते हैं. कुछ भी मीठा खाने या पीने से जल्द ही आपके दांतों पर प्लाक बनने लगते हैं. यही कारण है कि नियमित रूप से ब्रश करना महत्वपूर्ण है.

प्लाक आपके दांतों से चिपक जाता है और प्लाक में मौजूद एसिड धीरे-धीरे दांतों के इनेमल को मिटा सकता है. तामचीनी आपके दांतों पर एक मजबूत, सुरक्षात्मक कोटिंग है जो दांतों की सड़न से बचाता है. जैसे-जैसे आपका दांत इनेमल कमजोर होता है, सङन होने का खतरा बढ़ जाता है.

हर किसी को कैविटी का खतरा होता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा अधिक होता है. जोखिम कारकों में शामिल हैं:

* बहुत सारे शर्करा या अम्लीय खाद्य पदार्थ और पेय
* खराब मौखिक स्वच्छता दिनचर्या, जैसे कि रोजाना ब्रश या फ्लॉस नहीं करना
* पर्याप्त फ्लोराइड नहीं मिलना
* शुष्क मुँह
* आहार विकार, जैसे एनोरेक्सिया और बुलिमिया
* एसिड भाटा रोग, जो आपके दाँत तामचीनी पहने हुए पेट में एसिड हो सकता है

डेंटल कैविटी के लिए उपचार के विकल्प
अपने डॉक्टर को दांतों की संवेदनशीलता या दर्द जैसे असहज लक्षणों के बारे में बताएं. आपका दंत चिकित्सक मौखिक परीक्षा के बाद दांतों की सड़न की पहचान कर सकता है. हालाँकि, मौखिक परीक्षा से कुछ गुहाएँ दिखाई नहीं देतीं. इसलिए, आपके डेंटिस्ट सङन को देखने के लिए डेंटल एक्स-रे का उपयोग कर सकते हैं.

उपचार के विकल्प गंभीरता पर निर्भर करते हैं. कैविटी के इलाज के कई तरीके हैं.
* टूथ फीलिंग

इसमें डेंटिस्ट एक ड्रिल का उपयोग करता है और दांत से सङन सामग्री को निकालता है. इसके बाद डेंटिस्ट आपके दांतों में एक पदार्थ से भरता है, जैसे कि चांदी, सोना, या मिश्रित राल.
* क्राउन
ज्यादा गंभीर सङन के लिए, आपका डेंटिस्ट दांत के प्राकृतिक क्राउन को बदलने के लिए दाँत के ऊपर एक कस्टम-फिट कैप लगा सकता है. इस प्रक्रिया को शुरू करने से पहले डेंटिस्ट क्षययुक्त दांत सामग्री को हटा देता है.
* रूट केनाल
जब दाँत क्षय आपकी नसों की मृत्यु का कारण बनता है, तो आपका डेंटिस्ट आपके दाँत को बचाने के लिए एक रूट कैनाल लगता है. वे नर्व टिश्यू, ब्लड वेसल्स टिश्यू और आपके दांत के किसी भी क्षयग्रस्त क्षेत्र को हटा देते हैं. आपका दंत चिकित्सक तब संक्रमण की जाँच करता है और आवश्यकतानुसार दवा को दांतों के जड़ों में लगाता है. अंत में, वे दांत को भरते हैं और उस पर एक क्राउन भी रख सकते हैं.
* प्रारंभिक चरण उपचार
यदि आपका दंत चिकित्सक अपने प्रारंभिक चरण में डेंटल कैवटी का पता लगाता है, तो एक फ्लोराइड उपचार आपके दाँत तामचीनी को रिस्टोर कर सकता है और आगे होने वाले सङन को रोक सकता है.

एसिडिटी प्रॉब्लम इन चेस्ट - Acidity Problem In Chest Hindi!

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एसिडिटी प्रॉब्लम इन चेस्ट - Acidity Problem In Chest Hindi!

सिने में होने वाले एसीडिटी की समस्या को हार्ट बर्न या सीने में जलन भी कहा जाता है. मोटे तौर पर इसका कारण है एसिड रिफ्लक्स या अम्लपित्त. सिने में होने वाले एसीडिटी की समस्या को समझने के लिए हमें भोजन के पचने की प्रक्रिया को समझना होगा. जब हम भोजन को मुंह में चबाना शुरू करते हैं तो हमारे मुंह में उपस्थित लार भोजन में से स्टार्च को छोटे-छोटे मॉलिक्यूल में तोड़ने लगती है. इसके बाद भोजन, फ़ूड पाइप से होता हुआ पेट में जाता है. यहाँ पर पेट की अंदरूनी परत भोजन को पचाने के लिए स्टमक एसिड जैसे पाचक रसों का निर्माण करती है. आइए इस लेख के माध्यम से हम सिने में होने वाले एसीडिटी की समस्या को समझें.

क्यों होती है सीने में जलन?

कई लोगों में लोवर इसोफैगियल स्फिंक्टर (एलईएस) ठीक से बंद नहीं हो पाने के कारण पेट का एसिड वापस बहकर इसोफैगस में चला जाता है. जब एसिड इसोफैगास की दीवारों से टकराता है तो छाती में दर्द और तेज जलन महसूस होता है.

क्या है हार्ट बर्न के लिए जिम्मेदार एसिड रिफ्लक्स?
एसिड रिफ्लक्स या उस प्रक्रिया का नाम है जिसमें एसोफेगस से स्टमक एसिड वापस पेट में लौट जाता है. अक्सर ऐसा तब होता है जब आपने काफी समय से कुछ खाया न हो यानी कि आ खाली पेट हों. जब आप बहुत देर तक खाली पेट रहते हैं तो एन्ज़ाइम और एसिड पेट के खाने को पचने नहीं देते हैं जिसके परिणामस्वरूप एसिड बनने लगता है. इसकी वजह से लोअर इसोफेगल स्पिंचर (एलईएस) ठीक से काम नहीं करता है. फिर ग्रासनली, एसिड को पेट से ऊपर की ओर धकेलती है.

आप ये भी कह सकते हैं कि एसिड रिफ्लक्स का एक कारण लोवर इसोफैगियल स्फिंक्टर का खराब होना या ठीक से काम न कर पाना भी है. इसकी वजह से कई बार ऐसा भी होता है कि पेट में भोजन को पचाने वाला एसिड गले तक वापस चला आता है. ये इतना खतरनाक है कि इससे गले में घाव पैदा हो जाता है. कई बार इससे सांस लेने में दिक्कत, आवाज भारी हो जाना, और मुंह में छाले जैसी समस्याएं भी हो जाती हैं.

क्या अन्तर है एसिड रिफ्लक्स और हार्ट बर्न में?

  • अब यहाँ ये सवाल उठना तो लाजिमी है कि आखिर एसिड रिफ्लक्स और साइन में जलन में अंतर क्या है? तो यहाँ हम आपको ये बताना चाहेंगे कि एसिड का इसोफैगस में पहुंचना एसिड रिफ्लक्स है. ऐसा होने पर दर्द नहीं होता है. लेकिन जब इसोफैगस की अंदरूनी परत नष्ट हो जाती है और इसकी वजह से छाती के बीच में दर्द, जकड़न और बेचैनी होती है. इसे हार्ट बर्न कहते हैं.
  • यहाँ ये बात समझना भी जरुरी है कि एसिड रिफ्लक्स बिना हार्ट बर्न के भी हो सकता है. लेकिन हार्ट बर्न बिना एसिड रिफ्लक्स के नहीं हो सकता है. इसे यूँ समझें कि एसिड रिफ्लक्स कारण है और हार्ट बर्न उसका प्रभाव है. आपको बता दें कि जब सामान्य से अधिक मात्र में एसिड का स्राव होता है तो उसे जोलिंगर एलिसन सिंड्रोम कहते हैं.


एसिडिटी के कारण-

  • शारीरिक रूप से सक्रिय न रहना, नियत समय पर खाना न खाना और सामान्य से अधिक वजन होना एसिडिटी बढ़ाता है.
  • पेट पर दबाव पड़ना. यह मोटापा, गर्भावस्था, बेहद तंग कपड़े पहनने से हो सकता है.
  • हर्निया और स्क्लेरोडर्मा भी वजह हो सकती है.
  • खाना खाने के तुरंत बाद सो जाना.
  • मसालेदार भोजन, जूस, खट्टे फल, लहसुन, टमाटर आदि का अधिक मात्रा में सेवन.
  • धूम्रपान और तनाव से भी एसिडिटी होती है.
  • कुछ दवाएं जैसे एस्प्रिन, नींद की गोलियां और पेन किलर एसिडिटी के कारक का काम करती हैं.


लक्षण-

  1. छाती में दर्द: छाती में दर्द तब होता है जब पेट का एसिड इसोफैगस में पहुंच जाता है. इस स्थिति में तुरंत डॉक्टर को दिखाना बेहतर होगा.
  2. गले में खराश: पाचन तंत्र की समस्याओं के कारण भी गले की खराश हो सकती है. बिना सर्दी-जुकाम अगर खाने के बाद गले में दर्द होता है तो इसका कारण एसिड रिफ्लक्स हो सकता है.
  3. चक्कर आना: कई बार एसिडिटी के लक्षण चक्कर आने के रूप में भी दिखायी देते हैं.
  4. लार का अधिक स्राव: मुंह में अचानक लार का स्राव बढ़ने से एसिड रिफ्लक्स हो सकता है.


कई बीमारियों का कारण है एसिडिटी-
एसिडिटी एक बहुत ही सामान्य और आम समस्या है, पर अगर समय रहते इसका उपचार नहीं किया जाए तो यह समस्या कई अन्य रोगों को आमंत्रण दे सकती है.

  • अस्थमा-

कई बार एसिड के फेफड़ों में जाने से श्वसन तंत्र की समस्याएं हो जाती हैं. सर्दी और आवाज के साथ सांस लेना अस्थमा को ट्रिगर करने का कारक बन सकता है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि पेट का एसिड छाती की तंत्रिकाओं को ट्रिगर कर श्वास नलियों को संकुचित कर देता है. इतना ही नहीं जिन लोगों को पहले से अस्थमा है, उनमें अस्थमा दवाएं एसिडिटी को बढ़ा देती हैं.

  • एनीमिया

लंबे समय तक एसिडिटी का उपचार करने वाली दवाओं के सेवन से कई महत्वपूर्ण पोषक तत्वों, विटामिनों और मिनरल्स का अवशोषण प्रभावित होता है. आयरन का स्तर भी कम हो जाता है, जिससे एनीमिया हो सकता है.

  • हड्डियों का कमजोर हो जाना

एसिडिटी को नियंत्रित करने वाली दवाओं से कैल्शियम का अवशोषण भी प्रभावित होता है. जिसका प्रभाव जोड़ों के दर्द के रूप में दिखता है.

  • इसोफैगियल कैंसर और निमोनिया

गंभीर एसिडिटी का समय रहते उपचार न कराना इसोफैगियल कैंसर का कारण बन सकता है. इसके अलावा एसिडिटी में ली जाने वाली दवाओं से पेट में एसिड की कमी हो जाती है, जो बैक्टीरिया उत्पत्ति के लिए आदर्श स्थिति है. इससे फेफड़ों में संक्रमण और निमोनिया की आशंका बढ़ जाती है.

दालचीनी के घरेलू उपाय - Daalchini Ke Gharelu Upay!

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दालचीनी के घरेलू उपाय - Daalchini Ke Gharelu Upay!

प्राचीन काल में दालचीनी को इतना अनमोल औषधि माना जाता था कि यह सोने से भी ज्यादा महंगी थी. आप इसे बाज़ार में सूखे ट्यूबलर या फिर दालचीनी पाउडर के रूप में खरीद सकते है. इसमें एक मनमोहक सुगंध के साथ-साथ एक मीठा-सा और उष्म स्वाद भी है. दालचीनी में सिनामाल्डिहाइड, सिनामाइल एसीटेट और सिनामाइल मद्य नामक सक्रिय घटक होते हैं. साथ ही इसमें शक्तिशाली रोगाणुरोधी, एंटी-इंफ्लेमेटरी, संक्रामक विरोधी और एंटी-क्लोटिंग गुण होते हैं. यह एंटी-ऑक्सिडेंट, पॉलीफेनोल और मैंगनीज, लोहा और आहार फाइबर इत्यादि खनिजों का भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है. यह सभी आवश्यक पोषक तत्व आपके शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं. इसके अलावा यह शुगर, कार्बोहाइड्रेट, फैटी एसिड और एमिनो एसिड का एक प्राकृतिक स्रोत है. आइए इस लेख के माध्यम से दालचीनी के घरेलू उपयोग के बारे में जानें ताकि इस विषय में लोगों की जानकारी बढ़ सके.

1. डायबिटीज को नियंत्रित रखे-

दालचीनी टाइप-2 डायबिटीज पर सकरात्मक प्रभाव डालता है. यह बॉडी की इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया को बढ़ावा देता है और इस प्रकार ब्लड शुगर के स्तर को सामान्य बनाये रखने में शरीर की सहायता करता है. नियमित रूप से प्रति दिन डेढ़ चम्मच से कम दालचीनी लेने वाले टाइप 2 डायबिटीज मरीजों में ब्लड शुगर का लेवल कम पाया गया है. दालचीनी को दूध में डाल लें तो यह मिश्रण भी डायबिटीज के लिए फायदेमंद होता है.

2. कोलन में सुधार-
दालचीनी में मौजूद फाइबर, कैल्शियम और मैंगनीज मिनरल का संयोजन कोलन की कार्यक्षमता में प्रभावी सुधार ला सकता है. पित्त के निकास से, फाइबर कोलन सेल्स की डैमेज को रोकने में सहायक होता है, जिससे पेट के कैंसर का जोखिम कम हो जाता है. दस्त और कब्ज सहित आई.बी.एस के लक्षणों से राहत पाने में आहार फाइबर बहुत उपयोगी है.

3. श्वसन संक्रमण का इलाज-
आप श्वसन संक्रमण का स्पर्धी मुकाबला करने में दालचीनी की मदद करने के लिए नींबू का रस भी मिला सकते हैं. गल शोथ से छुटकारा पाने के लिए, पिसी हुई दालचीनी के एक या दो चम्मच का सेवन ग्रीन टी या फिर सेब की मदिरा के साथ करें.

4. दिमाग की कार्यशीलता बढ़ाए-
दालचीनी की मनभावन सुगंध सूंघ भर लेने से दिमाग सक्रिय हो जाता है. दालचीनी की सुगंध संज्ञानात्मक प्रसंस्करण को बढ़ा देती है और ध्यान, स्मरण शक्ति और कार्यशील स्मृति से संबंधित मस्तिष्क के कामकाज में काफी सुधार ला सकती है. जो लोग परीक्षा की चिंता या घबराहट से चिंतित हैं, वे मन को शांत रखने के लिए दालचीनी से बनी हुई चाय पी सकते हैं.

5. कैंसर से बचाए-
दालचीनी कैंसर की कोशिकाओं के प्रसार को कम कर सकती है. टेक्सास विश्वविद्यालय में किए गए शोध के अनुसार, दालचीनी शरीर में कैंसर की कोशिकाओं में वृद्धि को कम करती है और जब आहार में इसे नियमित रूप से शामिल किया जाये, तो यह कैंसर को रोकने में मदद करती है.

6. कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए-
दालचीनी आपके रक्त में ट्राइग्लिसराइड्स और एल.डी.एल. के स्तर को काफी कम कर सकती है, जिससे हृदय रोग के जोखिम को कम किया जा सकता है. दालचीनी में मौजूद सक्रिय संघटक कोशिकाओं की चीनी को चयापचय करने की क्षमता को 20 गुना तक बढ़ा देते हैं. अपने कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने के लिए, एक दिन में एक बार दालचीनी पाउडर को अपने कॉफी में या अपने दलिया पर छिड़क कर इसका सेवन करें.

7. परिसंचरण में प्रभावी-
दालचीनी में कौमारिन नामक एक यौगिक होता है जिसमें रक्त को पतला करने वाले गुण निहित हैं. इससे पूरे शरीर में रक्त परिसंचरण में सुधार आता है. हालांकि, यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि बहुत अधिक कौमारिन लिवर की कार्यशीलता पर प्रभाव डाल सकता है और उसे क्षति भी पहुंचा सकता है.

8. चकत्तेदार अध: पतन के उपचार में-
दालचीनी शक्तिशाली एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण से धन्य है जो मस्तिष्क के आंतरिक ऊतकों की निरंतर सूजन को कम करती है. इसके इस प्राभाव से कई न्यूरोलॉजिकल विकारों से शरीर को सुरक्षा मिलती है. दालचीनी के शक्तिशाली और प्राकृतिक घटकों में अल्जाइमर्स, पार्किंसंस, मल्टीपल स्केलेरोसिस, मस्तिष्क ट्यूमर और मेनिन्जाइटिस सहित विभिन्न प्रकार के न्यूरॉइडजनरेटिव रोगों की शुरुआत को या फिर उन्हें पूर्णत रोकने की क्षमता है.

9. गठिया के दर्द को कम करने में-
दालचीनी ने गठिया दर्द से जुड़े साइटोकिन्स को कम करने के लिए सकरात्मक प्रभाव दिखाए हैं. मरीजों को सुबह-शाम शहद के एक चम्मच के साथ दालचीनी पाउडर का आधा चम्मच मिलाकर खाने से एक हफ्ते के बाद गठिया के दर्द में काफी राहत मिली और वे एक महीने के भीतर दर्द के बिना चल-फिर भी पा रहे थे.

10. हृदय की रक्षा-
दालचीनी के विभिन्न एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के कारण, यह दिल और उसके आसपास की धमनियों को नुकसान और संक्रमण से बचाने में बहुत प्रभावी है. दालचीनी के उपयोग से शरीर को 'खराब' कोलेस्ट्रॉल से लड़ने में मदद मिलती है, जिसमें कुल कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफी कम हो जाता है. इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण भी आंतरिक ऊतकों में सूजन को ठीक करने और दिल के दौरे और बीमारी के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं.

दांत दर्द के घरेलू उपचार - Dant Dard Ke Gharelu Upchar!

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दांत दर्द के घरेलू उपचार - Dant Dard Ke Gharelu Upchar!

सफेद और चमकदार दांत किसे पसंद नहीं होते है. लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे भी जो खुलकर हंसना नजरअंदाज करते हैं, क्योंकि वो अपने पीले दांतों को लेकर सहज महसूस नहीं करते हैं. दांत पीले होने के कारण हो सकते है जैसे धीरे-धीरे बुढ़ापे आने पर दांत पीले पड़ जाता है, जेनेटिक फैक्टर, दांतों का ख्याल न रखने की वजह से या अत्यधिक चाय, कॉफी, टोबाको और स्मोकिंग इत्यादि. साथ ही, ज्यादा एंटीबायोटिक्स लेने से, मौसम में परिवर्तन, इन्फेक्शन और असंतुलित मेटाबोलिज्म के कारण भी दांत पीले पड़ने लगते हैं. अक्सर लोग डेंटिस्ट के पास जाकर दांतों का पीलापन दूर करते हैं, लेकिन इस प्रकार के उपाय में थोड़ा समय लेते हैं और महंगे भी होते हैं. अगर आप दांत साफ करना चाहते हैं तो कुछ कारगर घरेलू उपाय भी है जिनका इस्तेमाल आप घर बैठे-बैठे कर सकते हैं. आइए इस लेख के माध्यम से हम दाँत की सफाई की विभिन्न सुझावों के बारे में जानकारी प्राप्त करें ताकि लोगों को इस संबंध में जानकारी मिल सके.

1. नमक का प्रयोग करें-

सबसे पहले कुछ मात्रा में टूथपेस्ट और नमक को एक साथ मिला लें. अब जिस तरह से आप रोज ब्रश करते हैं उसी प्रकार इस मिक्सचर से ब्रश करें. अपने रोजाना के टूथपेस्ट के बजाए नमक और कुछ मात्रा में टूथपेस्ट के मिक्सचर से ब्रश करें. यह उपाय तब तक आजमाएं, जब तक आपको कोई बेहतर परिणाम न दिख जाए. नमक आपके दांतों के लिए बहुत अच्छा होता है, क्योंकि यह आपके दांतों का खोया हुआ मिनरल लौटाता है. इससे न केवल दांत साफ होते हैं बल्कि चमकते भी हैं. आप नमक और बेकिंग सोडा को भी मिलाकर पेस्ट तैयार कर सकते हैं. इसे फिर ऊपर बताए गए उपाय की तरह ही इस्तेमाल करें.

2. तुलसी-
सबसे पहले तुलसी की पत्तियों को सूरज में दो घंटे के लिए सूखा लें. इसके बाद, इन पत्तियों को मिक्सर में डालकर एक पेस्ट तैयार कर लें. फिर इस पेस्ट को टूथपेस्ट पर लगाएं. लगाने के बाद इस मिश्रण से अपने दांतों को ब्रश करें. अपने रोजाना के टूथपेस्ट की जगह पर ऊपर बताये गए मिश्रण का इस्तेमाल करें. इस मिश्रण का प्रभाव आप हफ्ते के अंदर ही देखने लगेंगे. तुलसी दांतों का पीलापन दूर करने में बेहद फायदेमंद होती है. इसके उपयोग से मुंह से आने वाली बदबू भी गायब हो जाती है.

3. केले का छिलका-
केले के छिलके को छोटा टुकड़े में कर लें और फिर उसे अपने दांतों पर लगाकर दो से तीन मिनट तक रब करें. इसके छिलके को प्रभावित क्षेत्र पर अच्छे से लगाएं. इसके लगाने के बाद कुछ मिनट तक दांतों को ब्रश से साफ न करें. इसे फिर रोजाना इस्तेमाल करने वाले टूथपेस्ट से दांतों को ब्रश करें. इस उपाय को पूरे दिन में दो बार दोहराएं. यह तब तक करें जब तक की आपके दांतों का पीलापन चला न जाए. केले के छिलके में कई मिनरल्स होते हैं जैसे मैग्नीशियम, पोटेशियम और मैगनीज. दांतों को सफेद करने के लिए यह एक कारगर उपाय माना जाता है.

4. सेब का सिरका-
सबसे पहले सेब के सिरके को जैतून के तेल के साथ मिला लें. फिर अपने टूथब्रश को इस मिश्रण में कुछ सेकेंड के लिए डुबोकर रखें. अब अपने ब्रश पर रोजाना इस्तेमाल में आने वाला टूथपेस्ट लगाएं और लगाने के बाद दांतों को ब्रश करें. इस उपाय को दांतों को साफ और चमकाने के लिए रोजाना दोहराएं. सेब का सिरका कुछ मात्रा में प्राकृतिक रूप से एसिडिक होता है और यह क्लींजिंग की तरह कार्य करता है. इस सामग्री को दांतों का पीलापन हटाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

5. गाजर के उपयोग से-
गाजर को सबे पहलें छील लें और फिर उसे कुछ टुकड़ों में काट लें. अब टुकड़ों को नींबू के रस में सिप करें और फिर उसे अपने दांतों में रब करें. रब करने के बाद तीन से पांच मिनट तक रस को ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. अब मुंह को अच्छे से धो लें. इस प्रक्रिया को पूरे दिन में एक बार जरूर दोहराएं. यह तब तक करें जब तक की आपको बेहतर और प्रभावी परिणाम न दिख जाए. गाजर में विटामिन ए होता है जो दांतों की परत के लिए बेहद स्वस्थ होता है. गाजर दांतों के पीलेपन से छुटकारा दिलाने और उन्हें साफ करने में मदद करता है.

6. बेकिंग सोडा-
1 चम्मच बेकिंग सोडा और कुछ मात्रा में टूथपेस्ट लेकर सबसे पहले बेकिंग सोडा को टूथपेस्ट के साथ मिला लें. अब दांतों को इस मिश्रण से साफ कर लें. फिर मुंह को गुनगुने पानी से धो लें. इसका इस्तेमाल कैसे करें – इस उपाय को हफ्ते में दो बार दोहराएं. बेकिंग सोडा में दांत सफेद करने वाले गुण होते हैं जो आपके पीले दांतों की समस्या को ठीक करते हैं. अगर बेकिंग सोडा और टूथपेस्ट के मिक्सचर से आपके दांत सफेद नहीं होते हैं तो आप बेकिंग सोडा को कुछ मात्रा में नींबू के जूस और सफेद सिरके के साथ भी मिला सकते हैं. अगर आप सिर्फ बेकिंग सोडा से भी दांतों को हफ्ते में तीन बार दो मिनट के लिए साफ करते हैं, तब भी आपको एक अच्छा परिणाम देखने को मिलेगा.

7. दांतों का पीलापन नींबू से हटाये-
सबसे पहले नींबू लें और फिर उसका जूस निकाल लें. अब इस जूस को नमक के साथ मिलाकर एक पेस्ट तैयार कर लें. फिर लगाने के बाद नींबू और नमक के मिश्रण को दांतों में रगड़ें. रगड़ने के बाद कुछ मिनट के लिए मिश्रण को दांतों में ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. फिर दांतों को गर्म पानी से धो लें. इस मिश्रण को हफ्ते में दो बार दोहराएं तब तक जब तक आपको एक अच्छा परिणाम न दिख जाए. नींबू में ब्लीचिंग के गुण होते हैं जो आपके पीले दांतों को सफेद करते हैं. नींबू में साइट्रिक एसिड होता है और अगर आप इसका अधिक इस्तेमाल करते हैं तो इससे दांतों की सफेद परत हट सकती है.

8. अदरक-
सबसे पहले एक अदरक का पेस्ट तैयार कर लें. फिर इस पेस्ट को दांतों में लगाकर रगड़ें. रगड़ने के बाद पेस्ट को दांतों में कुछ मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें. फिर अपने मुंह को ठंडे पानी से धो लें. अच्छा परिणाम पाने के लिए आप अदरक के उपाय को हफ्ते में तीन बार दोहरा सकते हैं. इस उपाय का अधिक इस्तेमाल न करें ,क्योंकि इसके तेज प्रभाव से जीभ जल सकती है. अदरक में विटामिन सी होता है. इसके गुण दांत को साफ करने में मदद करते हैं.

9. हाईड्रोजन पेरॉक्ससाइड आजमाएं-
इसे इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले एक ढक्कन हाईड्रोजन पेरॉक्ससाइड को एक ग्लास गुनगुने पानी में मिला दें. अब इस मिक्सचर को मुंह में डालकर कुछ मिनट तक कुल्ला करें. इससे आपके दांत साफ और चमकने लगेंगे. दांतों की देखभाल के लिए अपने रोजाना के रूटीन में हाईड्रोजन पेरॉक्ससाइड को हफ्ते से दस दिन तक उपयोग करें. हाईड्रोजन पेरॉक्ससाइड में ब्लीचिंग के गुण होते हैं और इस तरह यह दांत को साफ रखता है.

10. नीम की मदद से-
नीम के तेल के 3 से 4 बूँद को टूथपेस्ट के साथ मिला लें. अब इस मिश्रण से अपने दांतों को ब्रश करें. अपने रोजाना के पेस्ट का इस्तेमाल करने के बजाए इस मिश्रण से पूरे दिन में दो बार ब्रश करें. नीम को आयुर्वेद में उसके चिकित्सीय इलाज के लिए जाना जाता है. इसके इस्तेमाल से दांत सफेद लगने लगते हैं.

अरण्डी का तेल के फायदे - Arandi Ka Tel Ke Fayde!

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अरण्डी का तेल के फायदे - Arandi Ka Tel Ke Fayde!

अरंडी का तेल विशुद्ध रूप से वानस्पति तेल है जिसका इस्तेमाल हम कई समस्याओं को दूर करने के लिए करते हैं. वैज्ञानिक नाम रिसीनस कम्युनिस वाले अरंडी का पौधा मूल रूप से अफ्रीका और भारत में पाया जाता है. अपने देश में अरंडी के तेल को कई नामों से जाना जाता है -तेलुगु में अमुदामु, मराठी में इरांदेला टेला, तमिल में अमानकु एनी, मलयालम में अवानाककेना और बंगाली में रिरिरा टेला. इस तेल को बनाने के लिए इसके बीजों को दबाया जाता है. यह विभिन्न सौंदर्य प्रसाधन, साबुन, वस्त्र, मालिश तेलों और प्रतिरक्षा प्रणाली, फंगल संक्रमण का इलाज, त्वचा पिग्मेंटेशन का इलाज, बुढ़ापे की प्रक्रिया को धीमा करना, मुंहासों का इलाज करना और आंखों के इलाज में इस्तेमाल होता है. अरंडी का तेल या कैस्टर ऑयल, थोड़ा गाढ़ा और दिखने में हल्के पीले रंग का होता है. अरंडी के तेल में चेहरे के लिए विषेशरूप से उपयोगी रेजिनोलिक एसिड और कई अन्य फैटी एसिड मौजूद होते हैं. आइए इस लेख के माध्यम से हम अरंडी के तेल से होने वाले विभिन्न फ़ायदों पर एक नजर डालें ताकि इसके बारे में ज्यादा से ज्यादा लोग जान सकें.

1. मुहाँसो को करे दूर-

अरंडी का तेल मुँहासे वाले त्वचा के लिए बहुत कारगर होती है वो अधिकतर तेलों से दूर भागते है, क्योंकि तेल रोम छिद्रों और उनकी समस्या को बढ़ाते हैं. अरंडी के तेल का इस्तेमाल मुँहासे को कम करने में उपयोगी साबित हो सकता है. इसके लिए गर्म पानी से अपना चेहरा धो लें और यह आपके पोर्स को खोलने में मदद करेगा. इसके बाद तेल से हल्का हल्का अपने चेहरे पर मालिश करें और रातभर लगाने के बाद अगले दिन ठंडे पानी से अपना चेहरा धो लें. अरंडी का तेल राइसिनोलिक एसिड में भरपूर है जो मुँहासे से उत्पन्न बैक्टीरिया से लड़ता है. यह प्रभावी रूप से स्किन लेयर में प्रवेश करता है, जिससे यह मुँहासो के लिए एक कारगर समाधान है.

2. त्वचा के लिए-
अरंडी के तेल में रिकिनोलिक एसिड और अन्य फैटी एसिड मौजूद होते हैं जो स्किन को सॉफ्ट बनाने में मदद करते हैं. अरंडी का तेल आपको चिकनी और सॉफ्ट स्किन प्रदान करता है. इसलिए यदि आप एक किफायती और नेचुरल स्किन मॉइस्चराइजर की तलाश में है तो अरंडी का तेल सबसे उपयोगी है. आप अच्छी तरह से अपने चेहरे को साफ कर लें और इस तेल से धीरे धीरे मालिश करें. यह तेल एक अद्भुत मॉइस्चराइज़र है जो अत्यधिक ड्राई स्किन को निकालने में सहायता करता है.

3. मिटाए दाग धब्बों को-
अरंडी के तेल का इस्तेमाल अक्सर ब्लैक स्पॉट और स्ट्रेच के लिए किया जाता है. अरंडी के तेल में मौजूद फैटी एसिड की मदद से यह चेहरे को साफ़ करता है. यह फैटी एसिड स्किन के स्कार टिश्यू में प्रवेश करते हैं और इसके चारों ओर हेल्थी टिश्यू का विकास करते हुए इसे बाहर निकाल देते हैं. यह धीरे-धीरे काम करता है और इसलिए बेहतर परिणाम देखने के लिए इसे नित्य रूप से उपयोग करने की जरुरत होती है.

4. घावों को भरने में प्रभावी-
अरंडी का तेल कट्स और स्क्रैच पर एक अच्छे एंटीसेप्टिक के रूप में काम करता है. स्टडी से पता चला है कि जिन मलहम में अरंडी का तेल मौजूद होता है वे विशेष रूप से अल्सर को ठीक करने में उपयोगी हो सकते हैं. इसके रोगाणुरोधी गुण छोटे कट्स और स्क्रैच के उपचार के लिए इस असरदार बनाते हैं. इस तेल में सूजन को कम करने वाले गुण होते हैं तो यह दर्द को ठीक करने में भी मदद करता है. यदि घावों का अरंडी के तेल के साथ इलाज किया गया है, तो उन्हें अन्य उपचारों के मुकाबले कम समय में ज्यादा बेहतर परिणाम का अनुभव हुआ है.

5. लंबे बालों के लिए-
केस्टर ऑयल बालों के विकास को बढ़ाने के लिए एक अच्छा उपाय है. इसके साथ सिर की मालिश करने से आपको घने और लंबे बाल मिल सकते हैं. यह तेल रोम के ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ावा देता है, जिससे बालों का विकास तेज हो जाता है. इस तेल में ओमेगा 9 आवश्यक फैटी एसिड मौजूद है जो बालों को स्वस्थ बनाने में मदद करता है. स्कॅल्प इन्फेक्शन बालों के पैच, डैंड्रफ और खुजली जैसी मुख्य बाल समस्याओं का कारण हो सकता है. अरंडी के तेल का उपयोग कर के इन समस्याओं से निजात पाया जा सकता है.

6. रोके सफेद बालों पर नियंत्रण के लिए-
यदि आपके बालों ने सफेद होने के संकेत दिखाना शुरू कर दिए हैं, तो केस्टर ऑयल लगाने से आपके बालों के रंग को खोने से रोका जा सकता है. केस्टर ऑयल का इस्तेमाल, समय से पहले बालों के सफेद होने को रोकने के लिए एक प्रचलति तरीका है. यह आपके बालों का रंग बनाए रखने में मदद करता है. इसके अलावा, केस्टर ऑयल ड्राई और डैमेज बालों के उपचार में बहुत उपयोगी हो सकता है.

7. त्वचा की सूजन के लिए-
अरंडी के तेल में मौजूद मुख्य फैटी एसिड, रिकिनोलिक एसिड में प्रभावशाली गुण मौजूद होता है जो सूजन को कम करने में मदद करता है. स्टडीज के अनुसार अरंडी का तेल सूजन और दर्द को कम करने में मदद करता है. त्वचा की सूजन का उपचार करने के लिए केस्टर ऑयल एक कारगर औषधि है जो सनबर्न, मुँहासे और ड्राई स्किन के कारण हो सकती है. इसके लिए आप केस्टर ऑयल में कॉटन बॉल को डुबोकर प्रभावित त्वचा पर लगाएँ. इसे एक घंटे के बाद धो लें. केस्टर ऑयल में उपचार करने वाले गुण होते हैं जो कि सभी तरह की त्वचा की सूजन में मदद करते हैं.

8. एंटी एजिंग के लिए-
अरंडी के तेल त्वचा को बूढ़ा होने से रोक सकता है. यह तेल एंटी-एजिंग प्रभाव रखता है. जब इसे त्वचा पर लगाया जाता है तो यह त्वचा के अंदर गहराई से प्रवेश करता है और कोलेजन और ईलेस्टिन के उत्पादन को बढ़ाता है. यह बदले में स्किन को सॉफ्ट करने और नम करने में मदद करता है. यह रिंकल्स और फाइन लाइन्स की उपस्थिति को कम करता है और त्वचा को चिकनी, सॉफ्ट बनाता है. इसे इस्तेमाल से पहलें चेहरे को अच्छी तरह से पानी से धोकर साफ कर लें, अब अरंडी के तेल को चेहरे पर थोड़ा-थोड़ा करके लगाएं और चेहरे पर अच्छे से मसाज करें. इस प्रक्रिया को रोज़ रात में सोने से पहले आजमाएं और परिणाम देखें.

9. गठिया के इलाज में-
गठिया के कारण दर्द का उपचार करने के लिए अरंडी का तेल एक कारगर उपाय है. अरंडी का तेल जॉइंट और टिश्यू के दर्द से राहत प्रदान कर सकता है. एक कपड़े का टुकड़ा लें और उसे अरंडी के तेल में भिगोएँ. अतिरिक्त तेल को निकाल दे और प्रभावित जॉइंट पर कपड़ा रखें. इसके बाद एक प्लास्टिक रैप से इस कवर करें. अब इस पर एक गर्म पानी की बोतल या हीटिंग पैड रखें और एक घंटे तक छोड़ दें. अरंडी तेल में मौजूद सूजन को कम करने वाले गुणों की वजह से यह जॉइंट पेन, नर्व की सूजन और गले की मांसपेशियों को राहत देता है.

10. प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने में-
नेचुरोपैथी डॉक्टर का मानना है जब इसका ऊपरी त्वचा पर उपयोग किया जाता है तब अरंडी का तेल इम्यून सिस्टम को बढ़ाने में मदद करता है. यह आपके बॉडी के रक्षा तंत्र को भी बढ़ाता है. बाहरी रूप से इस्तेमाल करने पर टी -11 कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाती है, जो शरीर में रक्षा तंत्र में वृद्धि करती है. टी -11 कोशिकाओं में रोगजनकों और विषाक्त पदार्थों के खिलाफ एंटीबॉडी होते हैं, जो आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करते हैं.

11. स्ट्रेच मार्क्स के लिए-
स्ट्रेच मार्क्स आमतौर पर प्रेगनेंसी के कारण होते हैं. ज्यादा लोचदार त्वचा का मतलब है कम स्ट्रेच मार्क्स होना. अरंडी का तेल में फैटी एसिड भरपूर होती हैं इसलिए प्रेगनेंसी के लास्ट दो महीनों के दौरान इसका इस्तेमाल किया जाता है जो स्ट्रेच मार्क्स होने से रोकता है. जब इस तेल को प्रेगनेंसी के आखिरी दो महीनों के दौरान इस्तेमाल किया जाता है, तो यह स्ट्रेच मार्क्स को रोक सकता है. अरंडी के तेल को हाथ पर रखें और प्रभावित हिस्से पर 15-20 मिनट तक मसाज करें. बेहतर परिणाम के लिए इस प्रक्रिया को रोज़ करें.

12. दाद का इलाज-
अरंडी का तेल प्रभावी ढंग से सभी एज ग्रुप के लोगों में दाद जैसी एक सामान्य और जिद्दी समस्या का इलाज करता है. 2 चम्मच अरंडी तेल और 4 चम्मच नारियल तेल को मिक्स करके दाद वाली जगह पर लगाएँ. इस तेल में अंडरएलेनेनिक एसिड नामक एक एक्टिव एलेमेंट्स पाया जाता है जो दाद के उपचार में मदद करता है.

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प्रेगनेंसी स्ट्रेच मार्क्स - Pregnancy Stretch Marks In Hindi!

Bachelor of Ayurveda, Medicine and Surgery (BAMS)
Ayurveda, Lakhimpur Kheri
प्रेगनेंसी स्ट्रेच मार्क्स - Pregnancy Stretch Marks In Hindi!

प्रेगनेंसी के दौरान वजन बढ़ने और पेट बड़ा होने के कारण त्वचा पर खिंचाव पड़ता है, जिस वजह से स्ट्रेच मार्क्स होते हैं. चाहे आप गर्भवती न भी हों, लेकिन यदि आपका वजन तेजी से बढ़ रहा है, तो आपको स्ट्रेच मार्क्स हो सकते हैं. स्ट्रेच मार्क्स इसलिए होते हैं, क्योंकि पेट बढ़ने के कारण न केवल आपकी त्वचा की ऊपरी परत में स्ट्रेच पड़ता है, बल्कि निचली परतें भी खिंचती हैं. इससे कोलेजन थोड़ा-थोड़ा फट जाता है और ये ही स्ट्रेच मार्क्स के रूप में दिखाई देते हैं. जब त्वचा फैलती है इसके कोलाजेन कमज़ोर पड़ने लगते हैं. यही वजह है जीससे त्वचा पर फाइन लाइन्स दिखने लगती हैं, जिसे स्ट्रेच मार्क्स के नाम से जानते हैं. शुरू में स्ट्रेच मार्क्स रंग में लाल या गुलाबी होते हैं. आइए इस लेख के माध्यम से हम महिलाओं के प्रेगनेंसी के दौरान आने वाले स्ट्रेच मार्क्स को हटाने के विभिन्न घरेलू उपायों के बारे में जानें.

1. नींबू से-

नींबू के जूस को टांके का निशान पर लगाएं. दस मिनट तक इसे लगाकर ऐसे ही मसाज करते रहें और तब तक करें जब तक नींबू का जूस अवशोषित न हो जाए. फिर गर्म पानी से त्वचा को धो लें. इसके बाद त्वचा पर मॉइस्चराइज़र लगाएं. इसके अलावा आप एक चम्मच नींबू के जूस में में एक या दो चम्मच बेसन मिलाकर एक पेस्ट तैयार कर सकते हैं. और फिर उस पेस्ट को प्रभावित क्षेत्र पर लगा लें. दस मिनट तक उसे ऐसे ही सूखने दें और फिर गर्म पानी से त्वचा को धो लें. इस उपाय को पूरे दिन में एक या दो बार दोहराएं. नींबू का जूस टांके का निशान को कम करने का एक और प्रभावी उपाय है. नींबू का जूस प्राकृतिक रूप से एसिडिक है, जो कि टांके का निशान, मुहांसो के दाग और अन्य दाग का इलाज करने में और उसे दूर करने में मदद करता है.

2. सेब के सिरके का उपयोग-
स्प्रे बोतल में सेब के सिरके को डाल दें. फिर रात को सोने से पहले टांके का निशान पर उस बोतल को स्प्रे करें. फिर सूखने के लिए उसे ऐसे ही छोड़ दें. अब अगली सुबह अच्छे से त्वचा को साफ़ कर लें इसके बाद मॉइस्चराइज़र का इस्तेमाल करें. इस प्रक्रिया को रात को सोने से पहले दोहराएं. सेब का सिरका एसिटिक और मलिक से समृद्ध होता है जो दाग को कम करने में मदद करता है.

3. हल्दी से-
हल्दी को क्रीम या दही के साथ मिला दें जिससे कि एक पेस्ट तैयार हो सके. अब इस पेस्ट को टांके का निशान पर लगाएं और 10 से 15 मिनट के लिए इसके सूखने का इंतज़ार करें. फिर त्वचा को गर्म पानी से धो लें और फिर मॉइस्चराइज़र लगा लें. टांके का निशान को खत्म करने के लिए इस पेस्ट को पूरे दिन में दो बार दोहराएं. टांके का निशान से छुटकारा दिलाने में हल्दी बहुत ही अच्छा तरीका है. हल्दी में एंटीऑक्सीडेंट, सूजनरोधी और त्वचा को निखारने के गुण मौजूद होते हैं. रोज़ाना हल्दी के इस्तेमाल से आपको कुछ ही हफ्तों में फर्क दिखाई देने लगेगा.

4. जैतून तेल का उपयोग-
जैतून के तेल को गर्म कर लें. फिर तेल को प्रभावित क्षेत्रों पर लगाएं और लगाने के बाद कुछ मिनट तक मसाज करें. मसाज के बाद तेल को त्वचा पर ऐसे ही लगा हुआ रहने दें. जैतून के तेल को इस्तेमाल कैसे करें – इस प्रक्रिया को पूरे दिन में दो बार दोहराएं. ओलिव ऑयल पोषक तत्वों, विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता है. यह स्किन के लिए बेहद लाभदायक होता है और त्वचा सम्बन्धी परेशानियों का इलाज करने में सहायक होता है, जैसे टांके का निशान. इसके सूजनरोधी गुण भी स्ट्रेच मार्क्स के लिए बहुत कारगर हैं.

5. बादाम का तेल-
बादाम के तेल में अपने पसंदीदा आवश्यक तेल को मिलाएं. अच्छे से मिश्रण को मिलाने के बाद इसे कुछ सेकेण्ड के लिए गर्म होने को रख दें. गर्म होने के बाद मिश्रण को टांके का निशान पर लगा लें. इसके बाद कुछ मिनट तक मसाज करें और सूखने के लिए ऐसे ही छोड़ दें. इस प्रक्रिया को पूरे दिन में दो बार दोहराएं. बादाम के तेल में विटामिन ई और अन्य आवश्यक पोषक तत्व होते हैं जो त्वचा को पोषित करते हैं और उसका तेज़ी से इलाज करते हैं. ये साबित हो चूका है कि ये मिश्रण दाग को दूर करता है, त्वचा को मुलायम बनाता है और रंगत को सुधारता है.

6. बेबी तेल-
गर्म पानी से नहाने के बाद अपनी त्वचा को अच्छे से सूखा लें और फिर प्रभावित क्षेत्र पर बेबी तेल को लगाएं. लगाने के बाद त्वचा पर मसाज करें जिससे तेल अच्छे से अवशोषित हो जाए. फिर प्राकृतिक तरीके से तेल को सूखने दें. इस तेल को रोज़ाना नहाने के बाद इस्तेमाल करें. बेबी तेल में कई पोषक तत्व होते हैं जो स्किन को पोषण देते हैं और उन्हें कोमल और मुलायम बनाते हैं. यह भविष्य में होने वाले टांके का निशान से बचाता है.

7. बेकिंग सोडा-
बेकिंग सोडा को नींबू के जूस के साथ मिक्स कर लें जिससे कि एक पेस्ट तैयार हो सके. अब इस पेस्ट को प्रभावित जगह पर लगाएं और फिर क्लिंग रेप से उस क्षेत्र को कवर कर लें. इसे 20 से 30 मिनट के लिए ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. अब क्लिंग रेप रेप को हटा लें और फिर उस क्षेत्र को गर्म पानी से साफ़ कर लें. तेज़ी से टांके का निशान हटाने के लिए इस उपाय को रोज़ाना आजमाएं. बेकिंग सोडा को इस्तेमाल करने के फायदे – बेकिंग सोडा त्वचा को एक्सफोलिएट करता है और मृत कोशिकाओं को हटाता है जिससे टांके का निशान हल्के होने लगते हैं.

8. एलो वेरा जेल-
एलो वेरा से उसका जेल निकाल लें और अब जेल में विटामिन ए और विटामिन ई के कैप्सूल्स में मौजूद तेल को भी मिलाएं. अब इस मिश्रण को अच्छे से मिला दें और अब इसे त्वचा पर लगाएं. लगाने के बाद अच्छे से मसाज करें और तब तक करें जब तक ये मिश्रण अच्छे से अवशोषित न हो जाए. त्वचा को पानी से न धोएं. आप केवल एलोवेरा जेल को भी त्वचा पर लगा सकते हैं. 15 मिनट के लिए जेल को त्वचा पर ऐसे ही लगा हुआ रहने दें और फिर त्वचा को गुनगुने पानी से धो दें. इस उपाय को पूरे दिन में एक या दो बार दोहराएं और तब तक दोहराएं जब तक टांके का निशान पूरी तरह से चले ना जाएँ.

9. विक्स वेपोरब-
थोड़ी मात्रा में उँगलियों पर विक्स वेपोरब लें और इसे प्रभावित जगह पर लगाएं और इस्तेमाल करने के बाद एक या दो मिनट तक मसाज करें. इसके बाद उस जगह को क्लिंग रेप की मदद से कवर करें और रातभर के लिए उसे ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. इस उपाय को हर रात को दोहराएं जब तक टांके का निशान चले नहीं जाते. विक्स वेपोरब आवश्यक तेल से बना होता है जैसे नीलगिरी तेल, तारपीन तेल और सीडर की पत्तियों के तेल से. इसमें कपूर और पेट्रोलाट्म भी मिला होता है. ये सभी त्वचा को मॉइश्चराइज़ करने में मदद करते हैं और उन्हें मुलायम बनाते हैं.

10. अरंडी का तेल-
अरंडी के तेल को गर्म कर लें. फिर इस तेल से टांके का निशान पर 15 से 20 मिनट तक मसाज करें. इस प्रक्रिया को रोज़ाना रात को सोने से पहले दोहराएं. अरंडी का तेल त्वचा की बीमारियाँ और झड़ते बालों का इलाज तेज़ी से करता है. इसमें रिसिनोलिक एसिड होता है, जो कि त्वचा को कंडीशनिंग करता है और टांके का निशान का इलाज करता है और उन्हें हल्का करने में मदद करता है.

11. विटामिन ई तेल-
विटामिन ई के कैप्सूल्स को काट लें जिससे उसके अंदर का तेल निकल आये. अब इस तेल को टांके का निशान पर लगाएं और कुछ मिनट तक मसाज करें. मसाज करने के बाद इसे ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. इसके अतिरिक्त आप रोज़ाना विटामिन ई के कैप्सूल्स भी ले सकते हैं. इसे पूरे दिन में एक या दो बार दोहराएं. आमतौर पर विटामिन ई को क्रीम और लोशन में इस्तेमाल किया जाता है जिससे दाग और स्किन एजिंग से बचा जा सके. इसके एंटी-इंफ्लेमेटरी और एन्टिओक्सीडेंट गुण त्वचा को पोषण देते हैं, उन्हें स्वस्थ बनाते हैं साथ ही दाग और टांके का निशान का निदान करने की प्रक्रिया में भी मदद करते हैं. ये सूरज की रौशनी से भी आपको सुरक्षित रखता है.

12. टी ट्री तेल से-
चार से पांच बूँद टी ट्री तेल और एक या आधा चम्मच जैतून का तेल या नारियल के तेल के मिश्रण को एक साथ मिला लें. अब इस मिश्रण को टांके का निशान पर लगाने के बाद मसाज करें. तब तक अच्छे से मसाज करें जब तक त्वचा पर ये मिश्रण अवशोषित न हो जाये. इसके बाद ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. इस निदान को पूरे दिन में दो बार दोहराएं. टी ट्री ऑयल के लाभ तो कई हैं. लेकिन ज़्यादातर लोग ये नहीं जानते कि ट्री तेल के इस्तेमाल से टांके का निशान और दाग ठीक हो जाते हैं. इसमें सूजनरोधी गुण पाए जाते हैं जो इस समस्या का इलाज करने में प्रभावी है.

13. आर्गन तेल लाभदायक-
ऑर्गन तेल को हाथों में लेकर टांके का निशान पर लगाएं. लगाने के बाद कुछ मिनट तक मसाज करें. फिर त्वचा को पानी से न धोएं या पोछे नहीं. टांके का निशान से छुटकारा पाने के लिए इस उपाय को पूरे दिन में दो बार दोहराएं. ऑर्गन ऑयल को ज़्यादातर कॉस्मेटिक प्रोडक्ट में इस्तेमाल किया जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं और ये विटामिन ई से भरपूर होता है. ये त्वचा को पोषण प्रदान करता है और इसे ठीक करने में मदद करता है. इसी के साथ ये दाग और टांके का निशान को भी कम करता है.

14. जोजोबा तेल से-
जोजोबा तेल की कुछ बूँदें लें और फिर उसे टांके का निशान पर लगा लें. अब कुछ मिनट तक मसाज करें और फिर मसाज के बाद तेल को त्वचा पर ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. इस तेल को पूरे दिन में दो या तीन बार दोहराएं. जोजोबा तेल में सूजनरोधी और त्वचा का इलाज करने के गुण मौजूद होते हैं. जब आपको टांके का निशान दिखाई देने शुरू हो जाएँ तो तभी इस तेल का इस्तेमाल करना शुरू कर दें. इससे स्ट्रेच मार्कस को रोकने में मदद मिलेगी. ये त्वचा को पोषित करता है और उसका इलाज करता है और नई स्वस्थ कोशिकाओं को उत्तेजित करता है.

15. शिया बटर से-
शिया बटर को अपने प्रभावित क्षेत्रों पर लगाएं. लगाने के बाद इसे ऐसे ही लगा हुआ छोड़ दें. पूरे दिन में कई बार इस प्रक्रिया को दोहराने की कोशिश करें. त्वचा पर मॉइस्चराइज़िंग के अलावा, शिया बटर में एन्टिओक्सीडेंट और सूजनरोधी गुण भी मौजूद होते हैं. इस उपाय को रोज़ाना इस्तेमाल करने से त्वचा स्वस्थ होगी और खराब हुई कोशिकाएं ठीक होंगी.

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