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Apollo Taratala Behala

  4.4  (17 ratings)

Internal Medicine Specialist Clinic

taratala Kolkata
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Apollo Taratala Behala is known for housing experienced Internal Medicine Specialists. Dr. Anirban Chakraborty, a well-reputed Internal Medicine Specialist, practices in Kolkata. Visit this medical health centre for Internal Medicine Specialists recommended by 80 patients.

Timings

MON, THU
11:00 AM - 02:00 PM

Location

taratala
Taratala Kolkata, West Bengal - 700038
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Apollo Taratala Behala Image 1

Doctor in Apollo Taratala Behala

Dr. Anirban Chakraborty

MBBS, MRCP (UK), CCST, FRCP
Internal Medicine Specialist
87%  (17 ratings)
18 Years experience
800 at clinic
Available today
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अस्थमा का आयुर्वेदिक इलाज - Asthma Ka Ayurvedic Ilaaj!

Bachelor of Ayurveda, Medicine and Surgery (BAMS)
Ayurveda, Lakhimpur Kheri
अस्थमा का आयुर्वेदिक इलाज - Asthma Ka Ayurvedic Ilaaj!

अस्थमा श्वसन संबंधी रोग होता है जो सांस लेने में कठिनाई पैदा करता है. अस्थमा में श्वास नलियों की सूजन आ जाती है जिस कारण श्वसनमार्ग संकुचित हो जाता है. श्वसनमार्ग के संकुचित हो जाने से सांस लेते समय आवाज़ आना, श्वास की कमी, सीने में जकड़न और खाँसी आदि समस्याएं होने लगती हैं.
इस लेख के माध्यम से हम आपको अस्थमा का आयुर्वेदिक इलाज बताने जा रहे हैं.

अस्थमा का आयुर्वेदिक इलाज-


* आयुर्वेदिक दवाएं में कोई साइड इफेक्ट्स नहीं होता हैं और सुरक्षित है. यह अस्थमा के इलाज में बहुत हद्द तक कारगर है. कुछ आयुर्वेदिक दवाओं को शामिल कर के अस्थमा को ठीक किया जा सकता है जैसे कंटकारी अवालेह, अगस्त्याप्रश, चित्रक, कनाकसव इत्यादि.
* रात का खाना जितना हल्का हो सके लें व सोने से एक घंटे पहले ही खा लें.
* अस्थमा से बचने के लिए सुबह और शाम को टहलने के लिए निकलें. इसके अलावा योग में आसान भी कर सकते है जैसे ‘प्राणायाम’ और मेडिटेशन.
* अस्थमा के मरीज को मुश्किल एक्सरसाइज करने से बचना चाहिए.
* हवादार कमरे में रहें और सोएं. एयर कंडीशनर, कूलर और पंखों की सीधी हवा से बचें.
* अस्थमा रोगी को ठंडे और नम स्थानों से दूर रहना चाहिए.
* स्मोकिंग,टोबैको और ड्रिंक करने से बचे. कमरे में किसी खुसबूदार चीजे जैसे इत्र अगरबत्ती या अन्य चीजों का प्रयोग ना करें.
* गजर और पालक के उचित अनुपात मरीन मिलकर रोजाना रस पीएं.
* जौ, कुल्थी, बथुआ, द्रम स्तिच्क अदरक, करेला, लहसुन को अस्थमा रोगी को नियमित रूप से लेना चाहिए.
* मूलेठी और अदरक को आधा चम्मच एक कप पानी में डाल कर पीएं.
* तुलसी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती है, इसलिए अस्थमा के मरीजों को तुलसी का सेवन करना चाहिए.
* जो लोग इस रोग का सामना आकर रहे हैं, वह हर मौसम के आगमन पर पंचकर्म की नस्य या शिरोविरेचन की साहयता लें.
* यदि रात में अस्थमा का अटैक आ जाए, तो छाती और पीठ पर गर्म तिल के तेल का सेंक करें.
* घर में एक शीशी प्राणधारा की अवश्य रखें. उसमें अजवाइन का सत् होता है, जिसकी भाप दमा के दौरे में राहत देती है.
* एक चौथाई चम्मच सोंठ, छ: काली मिर्च, काला नमक एक चौथाई चम्मच, तुलसी की 5 पत्तियों को पानी में उबाल कर पीने से भी दमा में आराम मिलता है.
* एक चौथाई प्याज का रस, शहद एक चम्मच, काली मिर्च 1/8 चम्मच को पानी के साथ लें.

अस्थमा के घरेलू उपचार - Asthma Ke Gharelu Upchaar!

Bachelor of Ayurveda, Medicine and Surgery (BAMS)
Ayurveda, Lakhimpur Kheri
अस्थमा के घरेलू उपचार - Asthma Ke Gharelu Upchaar!

अस्थमा श्वसन संबंधी रोग होता है जो सांस लेने में कठिनाई पैदा करता है. अस्थमा में श्वास नलियों की सूजन आ जाती है जिस कारण श्वसनमार्ग संकुचित हो जाता है. श्वसनमार्ग के संकुचित हो जाने से सांस लेते समय आवाज़ आना, श्वास की कमी, सीने में जकड़न और खाँसी आदि समस्याएं होने लगती हैं. 
आइए इस लेख के माध्यम से हम अस्थमा के घरेलू उपचारों के बारे में जानें ताकि इस विषय में लोगों को जागरूक किया जा सके.

अस्थमा के कारण-

* जीवनशैली में परिवर्तन जैसे मिलावटी आहार और ज्यादा स्पाइसी खाना या सूखे आहार का ज्यादा सेवन
* स्ट्रेस या किसी बात के डर से भी अस्थमा हो सकता है
* ब्लड में किसी तरह का डिफेक्ट
* स्मोकिंग और टोबैको का सेवन
* नजल पाइप में धूल या मिट्टी फंस जाना
* प्रदुषण से होने वाली समस्या
* पर्यावरणीय कारक
* अधिक परिश्रम करना

अस्थमा के लक्षण-
* सांस फूलना और सांस लेने में तकलीफ होती है
* निरंतर खांसी आना
* सांस लेते समय व्हूप की आवाज आना
* छाती में संकुचन
* खांसी के साथ कफ का बाहर नहीं आना

अस्थमा के घरेलू उपचार-
* आयुर्वेदिक दवाएं बहुत सुरक्षित हैं और काफी हद तक समस्या का इलाज है. कुछ आम दवाओं कंटकारी अवालेह, अगस्त्याप्रश, चित्रक, कनाकसव का प्रयोग किया जा सकता है.
* रात का खाना जितना हल्का हो सके लें व सोने से एक घंटे पहले ही खा लें.
* सुबह या शाम टहलें और योग में मुख्य रूप से ‘प्राणायाम’ और भावातीत ध्यान करें.
* अस्थमा के मरीज अधिक व्यायाम करने से बचें.
* हवादार कमरे में रहें और सोएं. एयर कंडीशनर, कूलर और पंखों की सीधी हवा से बचें.
* इस दौरान आपको ठंडे और नम स्थानों से दूर ही रहना चाहिए.
* धूम्रपान चबाने वाली तम्बाकू, शराब और कृत्रिम मिठास और ठंडे पेय न लें. जिन्हें इत्र से इलर्जी हैं, वे अगरबत्ती, मच्छर रेपेलेंट्स का प्रयोग न करें.
* दो तिहाई गाजर का रस, एक तिहाई पालक का रस, एक गिलास रोज पिएं.
* जौ, कुल्थी, बथुआ, द्रम स्तिच्क अदरक, करेला, लहसुन का अस्थमा में नियमित रूप से सेवन किया जा सकता है.
* मूलेठी और अदरक आधा-आधा चम्मच एक कप पानी में लेना बहुत उपयोगी होता है.
* तुलसी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है, इसलिए अस्थमा के मरीजों को तुलसी का सेवन करना चाहिए.
* जो लोग इस रोग की चपेट में आ चुके हैं, उनके लिए हर ऋतु के प्रारम्भ में एक-एक सप्ताह तक पंचकर्म की नस्य या शिरोविरेचन चिकित्सा इस रोग की रोकथाम में सहायक होती है.
* दिल्ली के शालीमार बाग स्थित महर्षि आयुर्वेद अस्पताल में इसकी अच्छी व्यवस्था है.
* रात-विरात यदि दमा प्रकुपित हो जाए, तो छाती और पीठ पर गर्म तिल तेल का सेंक करें.
* घर में एक शीशी प्राणधारा की अवश्य रखें. उसमें अजवाइन का सत् होता है, जिसकी भाप दमा के दौरे में राहत देती है.
* एक चौथाई चम्मच सोंठ, छ: काली मिर्च, काला नमक एक चौथाई चम्मच, तुलसी की 5 पत्तियों को पानी में उबाल कर पीने से भी दमा में आराम मिलता है.
* एक चौथाई प्याज का रस, शहद एक चम्मच, काली मिर्च 1/8 चम्मच को पानी के साथ लें.
 

अर्जुन की छाल का उपयोग - Arjun Ki Chhal Ka Upyog!

Bachelor of Ayurveda, Medicine and Surgery (BAMS)
Ayurveda, Lakhimpur Kheri
अर्जुन की छाल का उपयोग - Arjun Ki Chhal Ka Upyog!

अर्जुन वृक्ष का नाम प्रमुख औषधीय वृक्षों में है. अमरूद की समान पत्तियों वाले लेकिन आकार में इससे बहुत बड़े अर्जुन वृक्ष का वैज्ञानिक नाम टर्मिमिनेलिया अर्जुना है. अलग-अलग क्षेत्रों में इसे धवल, कुकुभ और नाडिसार्ज जैसे नामों से भी जानते हैं. अर्जुन वृक्ष एक सदाबहार यानी हमेशा हरा-भरा आने वाला वृक्ष है. इसका इस्तेमाल ह्रदय रोग में प्राचीन काल से ही होता आ रहा है. अर्जुन वृक्ष के छाल के चूर्ण, काढ़ा, अरिष्ट आदि के रूप में उपयोग किया जाता है. तो आइए इस लेख के माध्यम से अर्जुन वृक्ष की छाल के फायदे को जानें.

1. मुंह के छालों के उपचार में

मुंह के छालों से परेशान व्यक्ति भी अर्जुन की छाल का उपयोग कर सकता है. इसके लिए नारियल के तेल में अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर मुंह के छालों पर लगाने से आपकी परेशानी निश्चित रूप से कम होगी. यही नहीं ऐसे थोड़े गुड़ के साथ लेने से बुखार में भी आराम मिलता है.

2. खांसी में
सूखे हुए अर्जुन वृक्ष की छाल का बारीक पाउडर, ताजे हरे अडूसे के पत्तों के रस में मिलाकर इसे फिर से सुखा लें. ऐसा इसी तरह से मिला-मिला कर सात बार के बाद जो चूर्ण बचता है. उसमें शहद मिलाकर खांसी पीड़ित को देने से वो राहत महसूस करता है.

3. मोटापा दूर करने में
मोटापे से परेशान लोग अर्जुन वृक्ष की छाल का काढ़ा सुबह शाम पीकर अपनी परेशानी कम कर सकते हैं. यह मोटापे को इतनी तेजी से कम करता है कि एक महीने में ही इसका असर दिखने लगता है.

4. शुगर में
शुगर के मरीज भी अर्जुन वृक्ष की छाल से अपनी परेशानी खत्म कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें अर्जुन वृक्ष की छाल का चूर्ण, देसी जामुन के बीजों के चूर्ण की समान मात्रा के साथ मिलाकर सोने से पहले गुनगुने पानी के साथ लें. दूसरा विकल्प है कि अर्जुन वृक्ष के छाल, कदम की छाल, जामुन की छाल और अजवायन एक समान मात्रा, पीसकर बारीक पाउडर बना लें. इस पाउडर में आधा लीटर पानी मिलाकर काढ़ा बनाएं और इस काढ़े को सुबह शाम 3 सप्ताह तक लगातार प्रयोग करें. इससे मधुमेह में राहत मिलेगी.

5. पेशाब की रुकावट दूर करने में
अर्जुन वृक्ष की छाल से बना हुआ काढ़ा पीने से पेशाब की रुकावट दूर होती है. इसके लिए अर्जुन वृक्ष की छाल को पीसकर दो कप पानी में उबालें जब जब पानी आधा रह जाए तो इसे ठंडा होने के बाद रोगी को पिलाएं. दिन में एक बार पिलाने से यह पेशाब की रुकावट को दूर कर देता है.

6. उच्च रक्तचाप को कम करने में
अर्जुन वृक्ष की छाल काफी लाभदायक साबित होती है. दरअसल इसकी छाल कोलेस्ट्रॉल को कम करके लिपिड ट्राइग्लिसराइड का स्तर भी घटाते हैं. इसके छाल का सेवन रक्त प्रवाह के अवरोध को भी दूर करता है. इसके लिए आपको एक चम्मच अर्जुन वृक्ष की छाल का पाउडर दो गिलास पानी में आधा रह जाने तक उबालकर इस पानी को सुबह-शाम पिएं. ऐसा करने से बंद हुई धमनियां खुल जाएंगी और कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी कम हो जाएगा.

7. बालों के विकास के लिए
अर्जुन वृक्ष की छाल का उपयोग हम बालों के विकास के लिए भी कर सकते हैं. सर के बाल में अर्जुन वृक्ष की छाल और मेहंदी का मिश्रण लगाने से सर के बाल सफेद से काले होने लगते हैं. इससे बालों में मजबूती भी आती है.

8. त्वचा के लिए
त्वचा की कई समस्याओं को खत्म करने में अर्जुन वृक्ष के छाल का असर प्रभावशाली होता है. अर्जुन वृक्ष की छाल, बदाम, हल्दी और कपूर की एक समान मात्रा को पीस कर उबटन की तरह चेहरे पर लगाएं ऐसा करने से चेहरे के सारे रिंकल्स चले जाते हैं और चेहरे में निखार आता है.

9. सूजन को कम करने में
भी अर्जुन वृक्ष के छाल की सकारात्मक भूमिका है. इसके लिए अर्जुन वृक्ष की छाल का महीन पिसा हुआ चूर्ण 5 से 10 ग्राम मात्रा में क्षीरपाक विधि से खिलाने से हृदय रोग के साथ-साथ इससे पैदा होने वाली सूजन में भी कमी आती है. इसके अलावा लगभग 1 से 3 ग्राम चूर्ण खिलाने से सूजन में कमी आती है. उससे संबंधित परेशानियां भी दूर होती हैं

10. ह्रदय से हृदय के विकारों में
ह्रदय से संबंधित तमाम विकारों जैसे की अनियमित धड़कन और सूजन आदि को दूर करने में भी अर्जुन वृक्ष का छाल सहायक होता है. यह स्ट्रोक के खतरे को भी कम करती है. इसके लिए अर्जुन वृक्ष की छाल को जंगली प्याज की समान मात्रा के साथ मिलाकर चूर्ण बनाएं इस चूर्ण को रोजाना आधा चम्मच दूध के साथ हृदय रोगी को देने से हृदय की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है. ये ब्लॉकेज में भी लाभदायक होता है. खाना खाने के बाद दो चम्मच लगभग 20 mm अर्जुनारिष्ट आधा कप पानी में मिलाकर दो 3 माह तक पीने से हृदय रोगियों को तमाम परेशानियों से मुक्ति मिलती है.

Frozen shoulder!

FSS, BPTh/BPT, PGDDCN(Dietetics and Clinical Nutrition)
Physiotherapist, Noida
Frozen shoulder!

Frozen shoulder is characterized by progressive pain and stiffness of the shoulder which usually resolves spontaneously after about 18 months. 

There are three phases that the condition will pass through; 
A freezing phase where the joint tightens up, a stiff phase where the movement in the shoulder is significantly reduced and a thawing phase where the pain gradually reduces and mobility increases.


Clinical features

  • Age - 40 - 60 yrs
  • History of trauma, often trivial followed by aching in the arm and shoulder.
  • Tenderness
  • Stiffness
  • Wasting

Cardinal features: stubborn lack of active and passive movements of shoulder in all directions.

Treatment: 

  • One should seek proffessional advise before attempting any frozen shoulder rehab.
  • Treatment is divided into two modes: conservative. And surgical.
  • Conservative treatment: physiotherapy plays an important role in the prevention as well as resolution of this condition. It aims to releive pain and prevent further stiffening with:
  • Rest
  • Non steroidal anti inflammatory drugs
  • Electrotherapy - ultrasound, tens & laser treatment may also help reduce pain and inflammation.

Therapeutic exercises

1 Pendulum exercise

2 Wand exercises

3 Therapist assisted mobilizations

4 Stretches - 

  • Shoulder flexion stretch
  • External rotation stretch
  • Chest stretch
  • Posterior shoulder stretch

 
5 Strengthening exercises

  • Isometrics shoulder exercises
  • Postural exercises - scapular squeezes

6 Taping

  • Surgery 
  • Surgery is the last resort if normal treatment has failed.

Unani Treatments - Know More About It!

Doctor In Unani Medicine(D.U.M.B.I.M)
Sexologist, Delhi
Unani Treatments - Know More About It!

Unani Treatments

For diagnosing the disease,
unani physicians (commonly known as hakims) feel the rhythmic expansion of arteries (nubz) of the patient. Mainly there are four types of unani treatments available:

Ilaj bil tadbeer (regimental therapy): It is a detoxification method that improves constitution of body by removing waste materials. Regimental therapy also protects health and increases defence mechanism of the body. Important techniques in regimental therapy include massage (dalk, malish), Turkish bath (hammam), exercise (Riyazat), leeching (Taleeq-e-Alaq) and venesection (Fasd).
Ilaj bil Ghiza (dietotherapy): As the name suggests, dietotherapy involves regulation of quantity and quality of your diet. Unani physician may ask you to increase intake of specific food that is helpful to alleviate symptoms of the disease.
Ilaj bil dawa (Pharmacotherapy): Natural drugs from plant, minerals and animal drugs are used in unani system. Potency and temperament of drugs are important consideration in unani treatment. The drugs are supposed to act according to their temperament .i.e. hot, cold, moist and dry. Unani medicines are available in form of tablets, decoctions, infusion, Jawarish, Majoon, Khamira, Syrup and powder.
Jarahat (Surgery): Ancient physicians of unani system were considered to be pioneer in the field. However, at present only

How To Increase Progesterone Levels?

Sexologist Clinic
Sexologist, Faridabad
How To Increase Progesterone Levels?

Progesterone is a naturally occurring steroid hormone that is made from cholesterol consumed in your diet. Normal levels of progesterone help to maintain a healthy hormonal balance. Progesterone plays a key role in the production of other important chemicals the body needs, such as cortisol and male hormones like testosterone. Lower than normal levels of progesterone can contribute to problems with the menstrual cycle, maintaining pregnancy, and common symptoms associated with menopause. Low levels of progesterone can be effectively treated using available prescription products and lifestyle changes.

Using Progesterone to Support Pregnancy
Talk with your gynecologist about increasing progesterone. Women that have recurrent or unexplained miscarriages often respond to treatment with progesterone, and are able to maintain the next pregnancy. 
Prevent early miscarriage. Progesterone deficiency is not the cause of every miscarriage, but scientific research indicates that adequate amounts of progesterone are needed to support the early stages of pregnancy. 
• Progesterone levels naturally increase during each menstrual cycle once ovulation has occurred. This allows for the uterine wall to thicken to provide support for the pregnancy. This is called the luteal phase. 
• Once the released egg has been fertilized, the lining of the uterus provides protection for the egg as it begins to develop. After the first few weeks, the placenta takes over, producing the additional hormones and nutrients needed. 
• Some women have naturally lower levels of progesterone. Some studies suggest that low levels during the first few weeks of pregnancy can cause the uterine lining to be inadequate to support the pregnancy, causing the miscarriage. Evidence for this is limited, however. 
• Inadequate levels of progesterone needed to support the early stage of pregnancy are sometimes referred to as a luteal phase defect.

Use progesterone vaginal inserts. Using progesterone vaginal inserts may help prevent early miscarriage, depending on the cause of the miscarriage. 
• The scientific literature supports the use of vaginally applied progesterone, via inserts or suppositories, to help maintain the lining of the uterus to support the pregnancy. 
• While other ways to administer progesterone are available, such as injections, oral dosing, and topical creams, for women with luteal phase defects and recurrent or unexplained miscarriages, this is the recommended method of delivery.

Supplement progesterone during assisted reproductive technology, or ART.ART helps to induce pregnancy by using procedures that remove the eggs from the woman, combine them with sperm in a laboratory setting, then return them to the woman’s body, or to another woman’s body. 
• There are many methods that help couples to achieve pregnancy. ART is one only one method. Women that participate in ART require supplementation of hormones, like progesterone, to help their bodies create a healthy environment to maintain the pregnancy.

Use injectable or vaginally administered progesterone. Progesterone administered by either intramuscular injection or by vaginal products have been shown to be effective in establishing the initial higher levels of progesterone needed during ART.
• Injectable progesterone is sometimes used but carries additional risks for complications since progesterone is very rapidly absorbed and is quickly changed into other chemicals.
• By altering the delivery system of the injection, the active progesterone can remain in its desired chemical form as long as possible. This means altering the liquid, or vehicle, the active drug is placed in, by using oils, such as peanut oil. Do not use this form of progesterone if you are allergic to peanuts
• Possible complications from progesterone injections include developing an allergy to the inactive ingredients, abscesses and pain at the site of injection, and unwanted bleeding into the muscle tissue.

 

Homeopathic Remedies & How They Are Beneficial For You

B.H.M.S, P.G.C.S.D.
Homeopath, Nagpur
Homeopathic Remedies & How They Are Beneficial For You

We are living with a ticking time bomb as several bacteria are becoming resistant to major antibiotics, which means that soon a simple wound may kill us. All living beings have an inherent quality to adapt. Bacteria and Viruses are not excluded from this. They have developed resistance against many antibiotics and form a major challenge for medical science.

In 2008, the International Journal of Cancer published a paper showing an increased risk of cancer proportional to antibiotic use in people. They found that in people who have taken 2-5 prescriptions of antibiotics, their risk of cancer was increased by 27%, and greater than 6 prescriptions led to an increased risk of 37%. An earlier study (2004) showed that antibiotic use was associated with an increased risk of breast cancer. For those taking antibiotics for more than 500 cumulative days, the risk of breast cancer doubled.

Over 100 leading integrative medicine specialists in the U.S. urgently called for a new strategy to confront the very dangerous challenges of the post-antibiotic era... including adding homeopathy as an adjunct therapy.

The Father of Immunology and winner of the Nobel Prize in medicine: Dr. Emil Adolf von Behring - discovered in the 1890s, during extensive experimentation, that homeopathic remedies produced enhanced immunogenic activity. Homeopathy is extremely safe, holistic and very effective.

Researchers in Europe recently looked at whether homeopathic treatment could improve survival rates in patients with severe sepsis (a deadly infectious condition).

Their conclusions: Patient survival was statistically significantly higher in the homeopathy group than in the placebo group.

As current research and epidemiological evidence show: Though homeopathy is not a money maker for the pharmaceutical industry, it is a safe and effective treatment option for infectious diseases, with no potential to create drug-resistant germs. In a nutshell, Homeopathy is needed to save humanity. Homeopathy is gentle and cost effective. If you wish to discuss about any specific problem, you can consult a homeopath.

6 Signs Your Core Muscles Are Week!

M. Ch. (Orthopedic), MS - Orthopaedics, Diploma In Orthopaedics (D. Ortho), MBBS
Orthopedist, Gurgaon
6 Signs Your Core Muscles Are Week!

The core muscles, mainly concentrated around the abdomen, hips, lower back, trunk, and glutes, are indeed a powerhouse that gets you going. The stronger the core muscles, the fitter you stay. Without a proper core strength, a lot of the day to day activities including lifting or bending gets affected. Certain health conditions can weaken the core muscles. But how to know if the core muscles are weak? There are many signs and symptoms associated with weak core muscles.

Mentioned below are some important signs that may be an indication of weak core muscles.

  1. For your posture to be correct, the spine and pelvis need to be stable: The muscles of the lower back and the abdomen does exactly that, ensuring a steady and correct posture. However, when the core muscles weaken, they are unable to provide stability to the spine and the pelvis resulting in a poor posture. Left unattended, poor posture, in turn, can trigger a myriad of complications and discomfort.
  2. The body loses its balance: As already mentioned, the core muscles go a long way in stabilizing the body and helping you to maintain the body balance. You can perform a small test to know if your balance is affected. Close your eyes and stand on one foot. Repeat the procedure with the other foot as well. If you have a developed core, you will be able to hold the position for at least 10 seconds, if not more (both the legs).
  3. A pain concentrated to the lower back: Do not ignore a lower back pain. It could be an indication of your core muscles not being strong enough, especially the ones adjacent to the spine. The weak muscles fail to provide the necessary support to the discs and the vertebrae resulting in pain (mild to severe depending on the severity of the condition) and discomfort. Timely medical intervention may help improve the condition.
  4. Weakness throughout the body: The strong core muscles are an indication of a healthy and fit body. When the muscles start to lose its strength, the entire body gets affected. A person finds it difficult to even lift things. Doing even a small and regular work leaves a person weak and tired.
  5. You can also perform the Hollowing Test to check your core strength: Sit in a comfortable position. Starting breathing in and out. As you breathe out or exhale, try to pull your stomach inwards towards the spine for at least 10 seconds. Unable to pass this test (can't hold the position for 10 seconds) indicates weak core muscles.
  6. You can also try the plank test: Get yourself in a push-up position with the entire body resting on your elbows, arms, and toes. The hip should be level and steady. Failing to stay in this position for 50 seconds is indicative of weak core muscles

Hypothyroidism - Can It Hamper Your IVF Chances?

MCH - Reproductive Medicine & Surgery, MS - Obstetrics & Gynaecology
IVF Specialist, Chennai
Hypothyroidism - Can It Hamper Your IVF Chances?

The thyroid gland is a small butterfly-shaped gland located at the base of the neck. This is responsible for producing the thyroid hormone that in turn helps regulate metabolism and other bodily functions. The production of less than normal amounts of thyroid hormone is termed as hypothyroidism. Stress, food intolerance, an unhealthy lifestyle and immune system disorders are some of the factors that could contribute to hypothyroidism.

Symptoms of hypothyroidism include

  1. Fatigue
  2. Weight gain
  3. Eczema
  4. Cramps and menstrual irregularities

In mild cases, there may be no visible effects on the person but in severe cases, it can reduce ovulation or cause the ovulation to stop completely. This can result in infertility. Hypothyroidism can also put a woman at a high risk of having a miscarriage.

Infertility can be treated in a number of ways. One of the most common amongst them is IVF or In Vitro Fertilization. This procedure involves stimulating the woman’s ovaries to produce eggs, harvesting them and combining them with sperm cells from the male partner in a laboratory. This increases the chances of forming an embryo. 2 or 3 of the healthiest embryos formed are then reinserted into the woman’s womb. When the embryo is successfully implanted, the woman may then carry the pregnancy to full term.

Many women who undergo IVF treatment give birth to twins or triplets. IVF typically has a very high success rate but when it comes to women suffering from hypothyroidism, this may not be the best course of treatment. This is because hypothyroidism can also prevent the embryos from being successfully implanted in the uterus.

For this reason, a thyroid test is essential before inserting the embryos into the uterus. This can be done with a simple blood test to measure the level of thyroid hormone in the blood. This test is known as a TSH test. Normal TSH levels range from 0.3 to 3.0 mIU/L. If the levels are unacceptable, medication will be prescribed to help regulate them. Dietary changes may also be required. Once the levels are within the normal range, the embryos can be inserted.

Women suffering from hypothyroidism must have regular checkups for the entire duration of their pregnancy. This will help doctors identify potential problems early and deal with them before they can affect the growing fetus. Even after giving birth, the woman should get her thyroid levels checked regularly while she is nursing the baby.

Pitta Dosha - All You Need To Know About It!

MS - Ayurveda
Ayurveda, Pune
Pitta Dosha - All You Need To Know About It!

The age old Ayurveda has answers to most problems regarding physical as well as mental health. Ayurveda states the presence of certain bodily energies throughout the body and mind which help in governing all the physical and mental processes. These energies are called doshas and Ayurveda classifies these doshas into three different parts, the Vata dosha, composed of space and air; the pitta dosha, composed of fire and water; the kapha dosha, composed of Earth and water.

The pitta dosha
As already discussed, the pitta is derived from the elements of fire and water and this is that energy which is in charge of all the heat, transformations and metabolism in human bodies. The pitta governs the digestion of food, metabolism of sensory perceptions, discrimination between right and wrong. So basically, pitta controls the fire in the body and is liquid in nature. The pitta carries out its functions through carrier substances like bile, enzymes, hormones and organic acid.

Qualities of pitta dosha
The various qualities exuded by pitta dosha include oily, hot, moving, sharp, liquid, acidic, and light and a pitta person will reflect these qualities in both the balanced as well as imbalanced states.

Location and task of pitta dosha
Pitta is mainly located in the small intestine, stomach, liver, pancreas, spleen, eyes, blood, and sweat. Pitta basically provides the body heat by breaking down the food molecules into absorbable units. Mentally, the pitta controls the inner joy, will power, courage, anger, mental perception, jealousy.

It can be comfortably said that the reason behind an individual’s anger, rage and jealousy is because of an unbalanced increase in pitta. Also pitta individuals tend to have oily skin. However, a balanced pitta individual usually has a very sharp intellect, a happy disposition towards life, enormous courage and drive to achieve. Imbalanced pitta can also cause inflammations, rashes, ulcers, fever, heat burns, and infections. So, it is very important to have a balanced pitta.

Here are some ways to balance pitta dosha

  1. Eating is peace
  2. Eating a balanced pitta diet
  3. Engaging in activities to calm the body and mind
  4. Meditating on a daily basis
  5. Spending time in nature
  6. Performing yoga and other calming exercises

Eating while angry, eating pitta increasing food, drinking coffee, tea, alcohol, smoking cigarettes; working more than necessary, and unnecessary competition are certain reasons for imbalance in the pitta dosha. Hence, controlling the inner fire and taming it, is mostly in the hands of the individuals themselves.

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